भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीकृष्ण के दिव्य गुण [ १४६ मुक्ति प्रदान की। इससे सिद्ध हो जाता है कि भगवान् की ब्रह्मज्योति में लीन होना, जो अद्वैतवादियों का लक्ष्य है, बहुत कठिन कार्य नहीं है। शिशुपाल जैसे लोग, जो जन्म-जन्म में श्रीकृष्ण का अपराध करते हैं, उन्हें तक यह मुक्ति मिल सकती है। २६. गम्भीर जो पुरुष अपने मनोभाव को सब से प्रकट नहीं करता, अथवा जिसके मन का आशय जानना बड़ा कठिन हो, वह गम्भीर कहा जाता है। जब ब्रह्मा से भगवान् श्रीकृष्ण का अपराध बन बैठा तो उसने क्षमा-याचना की। परन्तु उत्तम स्तुति करने पर भी वह यह नहीं समझ सका कि श्रीकृष्ण तुष्ट हो गए या अब भी रुष्ट हैं। भाव यह है कि श्रीकृष्ण ने गम्भीरता का परिचय देते हुए ब्रह्मस्तुति पर ध्यान नहीं दिया। गम्भीरता का एक अन्य उदाहरण राधारानी से श्रीकृष्ण के प्रेमविलास में है। श्रीकृष्ण राधा से अपने प्रेम के विषय में इतने गम्भीर रहते कि उनके अग्रज और चिरसंगी बलरामजी तक उनके मन के भाव को नहीं जान पाते। २७. धृतिमान् जिसकी सब इच्छायें पूर्ण हो चुकी हैं, इसलिए जो आत्मा में ही सन्तुष्ट रहता है और क्षोभ का महान् कारण होने पर भी शान्त बना रहता है, वह धृतिमान् है। श्रीकृष्ण की पूर्णस्पृहत्व का एक उदाहरण वह घटना है जब वे अर्जुन-भीम के साथ मगधराज जरासन्ध को चुनौति देने गए और श्रीकृष्ण ने जरासन्ध-वध का पूर्ण श्रेय भीम को दिया। इससे स्पष्ट है कि श्रीकृष्ण यश की इच्छा कभी नहीं करते, यद्यपि वास्तव में उन सा यशोमय दूसरा कोई नहीं हो सकता। क्षोभ का कारण होने पर भी शान्त रहने का गुण तब प्रकट हुआ जब शिशुपाल उन्हें अपशब्द कह रहा था। इस पर वहाँ विद्यमान सभी राजा और ब्राह्मण क्षुब्ध हो कर तत्काल उत्तम स्तुतियों से श्रीकृष्ण को प्रसन्न करने लगे। परन्तु उन सब को श्रीकृष्ण में कुछ भी क्षोभ दृष्टिगोचर नहीं हुआ। २८. समता जो राग-द्वेष से मुक्त हो उसे सम कहते हैं। श्रीकृष्ण की समता का उदाहरण श्रीमद्भागवत (१०.१६.३३) में