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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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पृष्ठ 177

१५० ] भक्तिरसामृतसिन्धु कालियदमन-लीला में है। जिस समय भगवान् श्रीकृष्ण कालिय को दण्डित कर रहे थे, तब उसकी स्त्रियाँ भगवान् के आगे कर यह विनती करने लगीं, "हे नाथ ! हमारे इस पापात्मा पति कालिय नाग को आपने जो दण्ड दिया है वह सर्वथा योग्य ही है, क्योंकि सब प्रकार के आसुरी जीवों का निग्रह करने के लिए आपका अवतार हुआ है। हम जानती हैं कि आप अपने शत्रुओं और पुत्रों को समान समझते हैं। इसलिए हे प्रभो ! आपने इस अधम का दमन इसके कल्याण के लिए ही किया है।" एक अन्य स्तुति में कहा है, "हे कृष्ण ! हे यदुवर ! आप इतने समद्रष्टा हैं कि यदि शत्रु योग्य हो तो उसका भी सम्मान करते हैं और पुत्र भी दुष्ट है तो उसके लिए भी दण्ड का विधान करते हैं। यही आपका कार्य है क्योंकि आप सम्पूर्ण ब्रह्माण्डों के रचयिता हैं। आप सब प्रकार के पक्षपात से रहित हैं। यदि किसी को आपकी कोई चेष्टा विषम प्रतीत हो तो निश्चित रूप से यह केवल उसका भ्रम है।" २६. वदान्य दानवीर पुरुष, जो उदारता से दान देता है, वह वदान्य कहलाता है। जब श्रीकृष्ण द्वारका में राज्य कर रहे थे, तब उनकी उदारता तथा दानवीरता की कोई अवधि न थी। वस्तुतः उनकी उदारता इस सीमा पर थी कि चिन्तामणि, सुरभि तथा कल्पवृक्षों आदि ऐश्वर्यों से युक्त वैकुण्ठ-जगत् का भी द्वारका में अतिक्रमण हो गया। श्रीकृष्ण के गोलोक- वृन्दावन नामक दिव्य धाम में सुरभि नामक गायें अपरिमित मात्रा में दुग्धामृत प्रदान करती हैं। वहाँ ऐसे असंख्य कल्पतरु हैं जिनसे सब प्रकार के फल यथेष्ट संख्या में प्राप्त किए जा सकते हैं। भूमि उस चिन्तामणि से रचित है, जिसके संसर्ग से लोहा भी स्वर्ण बन जाता है। भाव यह है कि श्रीकृष्ण के दिव्य धाम में सब कुछ अद्भुत ऐश्वर्यमय है। फिर भी जब श्रीकृष्ण द्वारका में विराजमान थे तो उनकी उदारता गोलोक-वृन्दावन के ऐश्वर्य से कहीं बढ़-चढ़ कर थी। श्रीकृष्ण जहाँ भी रहते हैं, गोलोक- वृन्दावन का अनन्त ऐश्वर्य स्वतः रहता है। यह भी उल्लेख है कि द्वारका में श्रीकृष्ण १६१०८ रूपों में प्रत्येक महिषी के साथ अलग महल में रहते थे। वे अपनी रानियों के साथ उन महलों में सुख से रहते ही नहीं थे, अपितु प्रत्येत महल से नित्य नियम से सुन्दर वस्त्र और अलंकारों से युक्त १३०५४ गौओं का दान भी करते थे