भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीकृष्ण के दिव्य गुण [ १५१ इस प्रकार वे प्रतिदिन कुल १६१०८ × १३०५४ गौओं का दान करते थे। इतने विशाल गोधन के दान के मूल्य की कल्पना भी नहीं की जा सकती; परन्तु द्वारका पर राज्य करते हुए श्रीकृष्ण का तो यह साधारण दैनिक कार्य था। ३०. धार्मिक जो स्वयं शास्त्र-विहित धर्म का आचरण करता है और दूसरों को भी उसकी शिक्षा देता है, वह धार्मिक है। केवल किसी मत में विश्वास होना धार्मिकता का द्योतक नहीं है। यह आवश्यक है कि स्वयं धर्म का आचरण करे और अपने निजी उदाहरण से दूसरों को भी शिक्षित करे। ऐसा व्यक्ति ही यथार्थ में धार्मिक है। इस धराधाम पर श्रीकृष्ण की उपस्थिति के काल में यहाँ अधर्म का नाम भी नहीं था। इस सन्दर्भ में नारदजी ने एक बार श्रीकृष्ण से परिहास में कहा था, “हे गोपेन्द्र ! आपके बैलरूपी धर्म के चारों चरण इस प्रकार बढ़े कि उसने अधर्म रूप सारी जात-पात को खा डाला।” भाव यह है कि श्रीकृष्ण की कृपा से धर्म का इस अच्छी प्रकार से रक्षण होता था, जिससे अधर्म देखने को भी दुर्लभ हो गया।” प्रसिद्ध है कि श्रीकृष्ण निरन्तर नाना यज्ञों में देवताओं का आह्वान करते रहते थे, जिससे वे देवता अपनी स्त्रियों से सदा दूर रहते। अतः पतियों के वियोग से संतप्त उनकी स्त्रियाँ कलियुग में प्रकट होने वाले भगवान् श्रीकृष्ण के नौवें अवतार बुद्धदेव के लिए प्रार्थना करने लगीं। भगवान् श्रीकृष्ण के अवतार से प्रसन्न होने के स्थान पर वे बुद्धदेव से अवतीर्ण होने की याचना करने लगीं, क्योंकि पशु-हिंसा रोकने के लिए बुद्धदेव वैदिक यज्ञों का निषेध कर देते हैं। देवांगनाओं ने विचार किया कि यदि बुद्धदेव का अवतार हो गया तो यज्ञ बन्द हो जायेंगे, जिससे उनका अपने पतियों से विछोह नहीं होगा। कभी-कभी जिज्ञासा होती है कि आजकल देवगण स्वर्ग से पृथ्वी पर क्यों नहीं आते ? इसका सीधा सा उत्तर यह है कि जब से भगवान् बुद्ध ने प्रकट होकर पशु-हिंसा रोकने के लिए यज्ञानुष्ठान का निषेध किया है, तब से यज्ञ-विधि का लोप सा हो गया है। अतः अब देवता यहाँ नहीं आते।