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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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पृष्ठ 179

अध्याय २२ श्रीकृष्ण के गुण (२) ३१. शूर जो युद्ध करने में उत्साही और नाना अस्त्रों के प्रयोग में दक्ष हो उसे शूर कहा गया है। श्रीकृष्ण की शूरवीरता के सम्बन्ध में एक वाक्य है, "हे रिपुनाशन ! सरोवर में नहाता गजराज जैसे सूंड के वेग से जल में सभी कमलों का उच्छेद कर देता है, वैसे ही गजतुण्ड-तुल्य अपनी भुजाओं के उत्तोलन से आपने कितने ही शत्रु रूपी कमलों का मर्दन कर दिया है।" श्रीकृष्ण की अस्त्र-प्रयोग-दक्षता के विषय में यह उल्लेखनीय है कि जब जरासन्ध ने १६,००० अक्षौहिणी सेना के साथ श्रीकृष्ण के दल पर आक्रमण किया तो वह उनके एक भी सैनिक को आहत नहीं कर सका। यह श्रीकृष्ण की दक्ष युद्धशिक्षा के कारण हुआ, जो युद्धकला के इतिहास में अद्वितीय है। ३२. करुण जिसके लिए दूसरे का दुःख असह्य हो, वह करुण है। श्रीकृष्ण का कारुण्य उस समय प्रकट हुआ जब उन्होंने मगधेन्द्र के बन्दी राजाओं का मोचन किया। अपनी मरण-शय्या पर श्रीकृष्ण की स्तुति करते हुए भीष्मपितामह ने कहा कि वे उस सूर्य के समान हैं जो अज्ञानरूप अन्धकार को हरता है। मगधेन्द्र ने अपने बन्दी राजाओं को अंधकारमय कक्षों में डाल रखा था। श्रीकृष्ण के वहाँ प्रकट होते ही अंधकार तत्काल दूर हो गया, मानो सूर्य उदित हो गया हो। भाव यह है कि मगधेन्द्र ने जितने भी राजा बन्दी बनाए थे, वे सब श्रीकृष्ण के वहाँ आते ही मुक्त हो गए। राजाओं पर अपनी अहैतुकी करुणा से अभिभूत होकर ही श्रीकृष्ण ने ऐसा किया।