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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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श्रीकृष्ण के गुण (२) [ १५३ श्रीकृष्ण की करुणा तब भी अभिव्यंजित हुई थी जब पितामह भीष्म बाणविद्ध अवस्था में पड़े थे । इस अवस्था में भीष्म श्रीकृष्ण के दर्शनार्थ अत्यन्त आतुर हो उठे, अतः श्रीकृष्ण को आना पड़ा । भीष्म की दयनीय अवस्था का अवलोकन करके श्रीकृष्ण अश्रुविमोचन करते हुए शोक करने लगे । वे आँसु ही नहीं बरसा रहे थे, बल्कि करुणा की बाढ़ में अपनी सुध-बुध भी भूल गए । इसीलिए सीधे श्रीकृष्ण को प्रणाम न करके भक्तजन उनकी करुणा को नमस्कार करते हैं। श्रीकृष्ण की प्राप्ति बड़ी कठिन है, क्योंकि वे परात्पर भगवान् हैं। परन्तु भक्त सदा राधारानी से प्रार्थना करते हैं, क्योंकि वे उनकी करुणा की मूर्तरूपा है। ३३. मान्यमानकृत गुरु, ब्राह्मण तथा वृद्धों का पर्याप्त सम्मान करने वाला मान्यमानकृत कहलाता है । जब पूज्यजन श्रीकृष्ण के समक्ष एकत्र होते तो श्रीकृष्ण क्रम से गुरुदेव, पिता और अग्रज बलरामजी को नमस्कार करते थे । इस प्रकार कमलनयन श्रीकृष्ण सम्पूर्ण व्यवहार में प्रसन्न और निर्मलहृदय थे । ३४. विनयी जिसमें औद्धत्य तथा अभिमान का अभाव हो वह विनयी है । श्रीकृष्ण का विनयी स्वभाव तब प्रकट हुआ जब वे युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में पधारे । महाराज युधिष्ठिर जानते थे कि श्रीकृष्ण स्वयं भगवान् हैं, इसलिए उनकी अगवानी के लिए वे रथ से उतर रहे थे । परन्तु इससे पहले कि वे उतर पायें भगवान् श्रीकृष्ण स्वयं अपने रथ से उतर पड़े और आगे दौड़ कर युधिष्ठिर का चरणस्पर्श किया । यद्यपि श्रीकृष्ण साक्षात् भगवान् हैं, फिर भी अपने व्यवहार में वे सदाचार का पालन करना कभी नहीं भूलते । ३५. दक्षिण सुशील स्वभाव के कारण जिसका व्यवहार बड़ा मृदु और कोमल हो उसे दक्षिण कहा जाता है । स्यमन्तकमणि हरण के प्रसंग में उद्धव के एक वाक्य से प्रमाणित होता है कि श्रीकृष्ण बड़े ही दयामय और कृपालु हैं। वे सेवक के महान् अपराध पर भी ध्यान नहीं देते, बस भक्त की सेवा देखते हैं।