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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

पृष्ठ 168, कुल 380 में से

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पृष्ठ 168

श्रीकृष्ण के दिव्य गुण [ १४१ प्रवाहित होने जैसा है, जो वापस जाकर सागररूपी श्रीकृष्ण को प्राप्त हो जाय।" भाव यह है कि वास्तव में श्रीकृष्ण को कोई उपदेश नहीं कर सकता, जैसे सागर को प्राप्त होने वाली सारी जलराशि का मूल स्रोत सागर स्वयं है। देखने में प्रतीत होता है कि नदियाँ सागर को जल से भर रही हैं। श्रीकृष्ण ने ब्रह्मा में वैदिक ज्ञान का संचार किया और ब्रह्मा से आगे शिष्य- परम्परा के द्वारा इस ज्ञान का प्रसारण हुआ। इसलिए सान्दीपनि मुनि के विद्या-उपदेश को उस नदी की उपमा दी गई है जो वापस जाकर कृष्णरूपी मूल सागर में मिल जाती है। सिद्धचारण श्रीकृष्ण की वन्दना करते हुए कहते हैं, "हे गोविन्द ! विद्या के चौदह गुणों से अलंकृत, जिसकी बुद्धि चारों वेदों में व्यापिनी है, जो मनु आदि की स्मृतियों से सदा युक्त हैं, जो शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द और ज्योतिष - वेद के इन छः अंगरूप परिधान से विभूषित है, पुराण जिसके सुहृद हैं, ऐसी मीमांसा से मण्डित सरस्वती को गुरुकुल में आप का संग सुलभ हो गया है। अब यह आपकी सेवा में संलग्न है।" भगवान् श्रीकृष्ण को किसी विद्या का अभाव नहीं है, वे तो केवल विद्यादेवी सरस्वती को अपनी सेवा का अवसर प्रदान करते हैं। श्रीकृष्ण पूर्णकाम हैं; अतः यद्यपि उनके असंख्य भक्त हैं, फिर भी उन्हें किसी भी जीव की सेवा अपेक्षित नहीं है। यह उनकी अहैतुकी करुणा और कृपा ही है कि वे सब को अपनी सेवा करने का अवसर देते हैं, मानो उन्हें अपने भक्तों से अपनी सेवा कराने की आवश्यकता हो। उनकी नीतिज्ञता के सम्बन्ध में श्रीमद्भागवत में कहा है, "तस्करों के लिए मृत्यु के समान, पुण्यात्मा पुरुषों के लिए आनन्ददायी वसन्त वायु के समान, रमणियों में परम मनोहर कामदेव के समान, बन्धु-बान्धवों के लिए आह्लादकारी पूर्ण चन्द्र के समान, दीनों में कल्याण के कल्पवृक्ष के समान, शत्रुओं के लिए भगवान् शिव के मुख की कालाग्नि के समान, व्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्ण मथुरा पुरी का शासन कर रहे हैं।" अस्तु, नाना प्रकार के लोगों के साथ व्यवहार करने में श्रीकृष्ण पूरे नीतिज्ञ हैं। जब उन्हें चोरों के लिए कालरूप कहा जाता है तो इसका अर्थ नहीं कि वे नीतिरहित अथवा निर्दयी हैं। वे तब भी कृपामय ही हैं क्योंकि अपराधियों को मृत्यु-दण्ड देना सब प्रकार से नीतिसंगत है। भगवद्गीता में भी श्रीकृष्ण कहते हैं कि जो उनसे जैसा व्यवहार करता है, वे भी उसके साथ वैसा ही करते हैं। उनका व्यवहार भक्तों और अभक्तों के साथ भिन्न- भिन्न होता है, परन्तु ये दोनों बराबर मंगलमय हैं। श्रीकृष्ण मंगलायतन

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