भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
पृष्ठ 167, कुल 380 में से
संदर्भ में पढ़ें१४० ] भक्तिरसामृतसिन्धु ने जल में प्रवेश किया और कालिय का शासन करके उसे वहाँ से अन्यत्र चले जाने का आदेश दिया । इस अवसर पर श्रीकृष्ण ने गोधन को देवों के लिए भी आराध्य कहा और साथ में गोरक्षा का आदर्श भी स्थापित किया । कम से कम कृष्णभावनाभावित पुरुषों को तो उनकी अनुगति में गोधन की सब प्रकार से रक्षा करनी चाहिए । गायें देवों की ही आराध्य नहीं हैं, स्वयं श्रीकृष्ण ने गोपाष्टमी, गोवर्धनपूजा आदि अवसरों पर गोपूजन किया है । १०. वावदूक कानों को प्रिय लगने वाले और विनय आदि वाणी के सम्पूर्ण गुणों से युक्त वचन कहने वाला वावदूक अर्थात् बोलने में निपुण कहलाता है । श्रीकृष्ण की श्रुतिप्रिय विनीत वाणी का उदाहरण श्रीमद्भागवत में है । जब श्रीकृष्ण ने नन्द बाबा से वर्षा के देवता इन्द्र का यज्ञ न करने का विनम्र निवेदन किया तो एक गोपगृहिणी मुग्ध हो उठी । बाद में कहने लगी, "हे सखी ! जो सरस और कोमल पदावली से युक्त होने के कारण मनोहर है और जिसके एक-एक अक्षर से अक्षय अमृतधारा झरती है, सब लोगों के कानों के लिए रसायन जैसी श्रीकृष्ण की वाणी ने किस का मन नही हर लिया ?" श्रीकृष्ण की वाणी ब्रह्माण्डभर के सारे वाग्गुणों से विभूषित है; इस के प्रमाण में उद्धव का यह वाक्य है—"शत्रुओं के हृदय को भी तत्काल बदल देने वाली, संसार के सारे संशय-दुःखों का अन्त करने वाली तथा मात्रा में अल्प होने पर विविध अर्थ वाली श्रीकृष्ण की वाणी मेरे हृदय को अतिशय प्रिय है ।" ११. सुपण्डित विद्वान् और नीतिज्ञ पुरुष को सुपण्डित कहा जाता है । अखिल विद्याओं का ज्ञाता विद्वान् कहलाता है और यथोचित कार्य करने वाला नीतिज्ञ है । इन दोनों गुणों के समुच्चय का नाम सुपाण्डित्य है । श्रीकृष्ण के सान्दीपनि मुनि से शिक्षा ग्रहण करने का वर्णन नारद जी ने इस प्रकार किया है, "ब्रह्मादिक उन मेघों के समान हैं, जो कृष्णरूप महासागर के जल से बने हैं । सागर से जैसे मेघ को जल मिलता है, वैसे सर्वप्रथम ब्रह्माजी ने श्रीकृष्ण से वैदिक ज्ञान पाया । ब्रह्मा द्वारा जगत् में प्रवर्तित वही वैदिक ज्ञान फिर सान्दीपनि मुनि रूप शैल में रहा । सान्दीपनि का श्रीकृष्ण को उपदेश करना पर्वत से उस नदीरूप में जल