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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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१४२ ] भक्तिरसामृतसिन्धु हैं, इसलिए सब के साथ उनके व्यवहार में भी मंगल ही मंगल है। १२. बुद्धिमान् तीक्ष्ण स्मृति और सूक्ष्म बुद्धि वाले को बुद्धिमान् कहा जाता है। श्रीकृष्ण की स्मृति की तीक्ष्णता के विषय में कथन है कि अवन्तीपुर में स्थित सान्दीपनि मुनि के आश्रम में अध्ययन करते हुए श्रीकृष्ण गुरु से एक बार जो शिक्षा सुन लेते थे, तत्काल उस विषय में पूर्ण निष्णात् हो जाते थे। वास्तव में तो सान्दीपनि के गुरुकुल में जाकर वे जगत् के सामने यह आदर्श रखना चाहते थे कि चाहे कोई कितना भी महान् अथवा दक्ष क्यों न हो, पर विद्या के लिए किसी बड़े के पास अवश्य जाना पड़ेगा। महान् से महान् व्यक्ति के लिए भी गुरुशरण में जाना अनिवार्य है। श्रीकृष्ण की सूक्ष्म बुद्धि तब प्रकट हुई जब वे मथुरापुरी पर आक्रमण- कारी म्लेच्छराज से युद्ध कर रहे थे। वैदिक विधान है कि क्षत्रिय राजाओं को म्लेच्छों को मारने के लिए भी स्पर्श नहीं करना चाहिए। अतः जब उस म्लेच्छराज ने मथुरा को घेर लिया तो श्रीकृष्ण ने उसे अपने हाथों मारना अच्छा नहीं समझा। पर उसे मारना भी अवश्य है; इसलिए अपनी सूक्ष्म बुद्धि का परिचय देते हुए श्रीकृष्ण ने युद्धभूमि से भागने का निश्चय किया, जिससे यवनराज उनका पीछा करे। तब वे उसे उस कन्दरा में ले गए जहाँ मुचुकुन्द निद्रामग्न था। मुचुकुन्द को शिवजी से यह वर था कि निद्राभग्न होने पर उसकी दृष्टि जिस पर पड़ जायगी, वह तत्क्षण भस्म हो जायगा। अतः श्रीकृष्ण बुद्धिमानी से म्लेच्छराज को उस कन्दरा में ले गए जहाँ मुचुकुन्द निद्रामग्न था और इस प्रकार उसे भस्म करा दिया। १३. प्रतिभाशाली जो तुरन्त नए-नए तर्कों से किसी भी विपक्ष का प्रतिकार करने में कुशल हो, उसे प्रतिभाशाली कहते हैं। इस सन्दर्भ में पद्यावली में श्रीराधा- कृष्ण का यह संवाद है। एक दिन प्रातः जब श्रीकृष्ण राधारानी के पास गए तो वे पूछने लगीं- "हे केशव ! आजकल तुम्हारा वास कहाँ है?" संस्कृत में 'वास' शब्द के तीन अर्थ हैं-निवास, सुगन्ध तथा वस्त्र। श्रीराधारानी का अभिप्राय था, "हे कृष्ण ! तुम्हारा वस्त्र कहाँ है ?" परन्तु श्रीकृष्ण ने उसे निवास मानकर उत्तर दिया- "हे प्रिये ! इस क्षण मेरा वास तुम्हारे चंचल नेत्रों में है।" इस पर राधारानी ने कहा- "अरे शठ ! मैं निवास-स्थान को नहीं, तुम्हारे वास (वस्त्र) को पूछ रही हूँ।"