भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२२ ] भक्तिरसामृतसिन्धु ही कृष्णभावना में सफलता प्राप्ति का मूल्य है। किसी भी वस्तु की उपलब्धि उसका मूल्य देने पर ही होती है। वैदिक शास्त्रों में उल्लेख है कि परम मूल्यवान् वस्तु—कृष्णभावना को खरीदने के लिए अर्थात् सिद्धि-लाभ के हेतु प्रगाढ़ उत्कण्ठा को उदित करना होगा। बिल्वमंगल ठाकुर ने स्वरचित कृष्णकर्णामृत में उत्कण्ठा का अत्यन्त सजीव सुन्दर चित्रांकन किया है। वे कहते हैं, “मेरे नेत्र व्रजकिशोर की काली भौंहों से परिवेष्टित, कमलदल के समान सघन और उन्नत नेत्रों से युक्त, अनुरागभरी और चंचलतामयी दृष्टि से भक्तों को निहारती हुई, मृदु वचनों में आर्द्रता ओतप्रोत, अधरामृत पर रक्तवर्ण और मधुर वंशीरव में अलौकिक मदभरी जगत् को मोहित करने वाली मूर्ति को वृन्दावन में देखने को आतुर हैं।” नामगान में सदा रुचि कृष्णकर्णामृत में ही सखी राधारानी का यह वर्णन सुनाती है, “हे गोविन्द ! अपने नयनकमलों से अश्रुबिन्दुरूपी मकरन्द को निस्यन्दित करती हुई वृषभानुनन्दिनी बाला आज आप की नामावली को मधुरस्वर से गा रही है ।” भगवान् के दिव्य गुणों का गान भगवान् के गुणगान में आसक्ति का वर्णन कर्णामृत में इस प्रकार है—“ओह ! मन्मथ-मथन श्रीकृष्ण का माधुर्य से भी अधिक मधुर और चापल्य से भी अधिक चपल अनिर्वचनीय कैशोर बलात् मन को हरण किए जा रहा है। अरे ! मैं क्या करूँ ?” श्रीकृष्ण के लीलास्थलों में प्रीति श्रील रूप गोस्वामी की पद्यावली में वृन्दावन का यह विवरण है, “यहाँ पर नन्दमहाराज के घर नन्दनन्दन रहते थे; यहाँ श्रीकृष्ण ने उस शकट का भंजन किया जिसमें शकटासुर छिपा हुआ था और यहाँ भव- बन्धन से मुक्तिदाता दामोदर को यशोदा मैया ने रस्सी से बाँधा था।” श्रीकृष्ण का शुद्धभक्त मथुरामण्डल अथवा वृन्दावन में वास करता हुआ श्रीकृष्ण की सारी लीलास्थलियों का दर्शन करता है। इन परम पावन स्थलों पर श्रीकृष्ण ने ग्वालबाल और यशोदा मैया के साथ भाँति- भाँति की लीलायें की थीं। कृष्णभक्तों में इन स्थानों की परिक्रमा करने की परिपाटी अद्यावधि प्रचलित है और मथुरा-वृन्दावन को जाने वाले