भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
पृष्ठ 148, कुल 380 में से
संदर्भ में पढ़ेंभाव के लक्षण (अनुभाव) [ १२१ अभिमान न करना मानशून्यता है। पद्मपुराण में उल्लेख है कि चक्रवर्ती सम्राट् भगीरथ में श्रीकृष्ण के लिए ऐसे अतिशय भाव का उदय हुआ कि वे अपने शत्रुओं के राज्य में भिक्षा माँगते हुए दीनभाव से चाण्डालों तक को नमस्कार करने लगे। इतिहास में भक्तों के ऐसे बहुत से उदाहरण हैं। केवल दो सौ वर्ष पहले कलकत्ते का लालबाबू नामक बहुत बड़ा जमींदार वैष्णव हो गया और वृन्दावन में वास करने लगा। वह घर-घर जाकर, यहाँ तक कि अपने पूर्व के शत्रुओं के घर भी भिक्षा माँगता। भिक्षुक को सब प्रकार का अपमान सहना पड़ता है। यह स्वाभाविक है। परन्तु श्रीकृष्ण के लिए इन अपमानों को सहन करना चाहिए। कृष्णभक्त श्रीकृष्ण ही सेवा के लिए तुच्छ से तुच्छ पद भी ग्रहण करने में संकोच नहीं करता। आशाबन्ध भगवान् की कृपा अवश्य होगी—यह दृढ़ विश्वास आशाबन्ध कहलाता है। भक्त की निरन्तर यही भावना रहती है—“मैं विधिभक्ति के लिए प्राणपण से यत्नशील हूँ; इसलिए भगवान् को फिर से अवश्य प्राप्त हो जाऊँगा।” इस सन्दर्भ में श्रीमत् सनातन गोस्वामी की एक प्रार्थना से आशाबन्ध का स्वरूप स्पष्ट हो जाता है। वे कहते हैं, “मुझमें न कृष्णप्रेम है और न कृष्णप्रेम के श्रवण, कीर्तन आदि साधनों में ही मेरी प्रीति है तथा जिस भक्तियोग के द्वारा निरन्तर श्रीकृष्ण का चिन्तन करते हुए हृदय उन्हीं के चरणकमलों में एकाग्र रहता है, उसका भी मुझ में अभाव है। मेरे लिए ज्ञान अथवा शुभ कर्म की भी कोई सम्भावना नहीं है। इसलिए हे गोपीजनवल्लभ श्रीकृष्ण मैं तो बस आपके सामने रुदन (प्रार्थना) ही कर सकता हूँ। मेरी एकमात्र अभिलाषा है कि जिस किसी प्रकार आपके चरणकमलों की मुझे प्राप्ति हो जाय। यह इच्छा मुझे व्यथित कर रही है, क्योंकि जीवन को उस दिव्य लक्ष्य की प्राप्ति के मैं सर्वथा अयोग्य समझता हूँ।” तात्पर्य यह है कि घोर निराशा में भी यह आशा बनाए रखनी चाहिए कि जैसे- तैसे भगवान् के चरणसरोज की प्राप्ति तो मुझे हो ही जायगी।” समुत्कण्ठा भक्तियोग में सिद्धि-लाभ के लिए अतिशय लुब्धता का नाम समुत्कण्ठा है। भक्ति के लिए पूर्ण लोभ होना आवश्यक है। वास्तव में यह लोभ