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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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रागानुगाभक्ति (२) [ ११३ उदय हो सकता है। इसका प्रत्यक्ष प्रमाण पद्मपुराण में है—"पूर्वकाल में दण्डकारण्य के निवासी सारे ऋषि-मुनि भगवान् श्रीराम की रूपमाधुरी को देखकर इतने लुब्ध हो गए कि स्त्रीरूप में उनका आलिंगन करने की इच्छा करने लगे। कालान्तर में गोलोक वृन्दावन में श्रीकृष्ण का अवतरण होने पर ये ऋषिगण भी गोपियों के रूप में वहाँ उत्पन्न हुए। इस प्रकार भगवान् को प्राप्त होकर उनका जीवन सिद्ध हो गया।" दण्डकारण्य के ऋषियों की कथा इस प्रकार है। जब भगवान् रामचन्द्र जी दण्डकारण्य में विराज रहे थे तो वहाँ भक्तियोग में लगे हुए तपस्वी मुनिजन उनकी रूपमाधुरी पर मुग्ध होकर श्रीकृष्ण के साथ माधुर्य- प्रेमलीला का आस्वादन करने वाली गोपियों के चिन्तन में मग्न हो गये। यहाँ स्पष्ट है कि यह जानते हुए भी कि श्रीरामचन्द्र और श्रीकृष्ण एक ही परमेश्वर हैं, उन्होंने गोपियों की ही माधुर्यरति की इच्छा की। उन्हें ज्ञात था कि रामचन्द्र आदर्श राजा होने के कारण एक से अधिक पत्नी अंगीकार नहीं कर सकते; परन्तु भगवान् श्रीकृष्ण वृन्दावन में उन सब की अभिलाषा पूर्ण कर सकते हैं। उन ऋषियों ने यह भी निर्णय किया कि कृष्णरूप श्रीराम के रूप से अधिक मधुरिमामय (आकर्षक) है। अतः उन्होंने भावी जन्म में गोपी बनकर श्रीकृष्ण का संग पाने के लिए प्रार्थना की। भगवान् राम ने उनके इस निवेदन को मौन सम्मति प्रदान की थी। श्रीराम के इस वर के फलस्वरूप अगले जन्म में वे भगवान् श्रीकृष्ण का संग करने के हेतु गोकुल की गोपियों के गर्भ से स्त्रीरूप में जन्मे और अपनी पूर्व अभि- लाषा के अनुसार गोकुल वृन्दावन में विराजमान भगवान् श्रीकृष्ण के संग का आस्वादन किया। इस प्रकार भगवान् श्रीकृष्ण के साथ माधुर्य- प्रेम के विनिमय की दिव्य भावना को उद्भावित करके उन्होंने अपने मानव जीवन को कृतार्थ कर लिया। माधुर्यरति के दो भेद हैं--पति-पत्नी का स्वकीया प्रेम और प्रियतम में होने वाला परकीया प्रेम। जिसमें श्रीकृष्ण का स्वकीया प्रेम का उदय होता, वह भक्त द्वारका में उनकी महिषी बनता है। श्रीकृष्ण से परकीया प्रेम वाले गोलोक-वृन्दावन में प्रविष्ट होकर गोपियों के साथ श्रीकृष्ण से प्रेमरस का विनिमय-आस्वादन करते हैं। यह ध्यान रहे कि गोपी अथवा महिषी के रूप में भी यह कृष्णप्रेम स्त्रियों तक ही सीमित नहीं है। पुरुष भी इस भाव का सेवन कर सकते हैं, जैसे दण्डक वन के ऋषियों ने किया था। यदि कोई माधुर्यप्रेम तो चाहता है पर गोपियों के चरणचिह्नों की अनुगति नहीं करता, तो वह द्वारका में श्रीकृष्ण का महिषी-पद पाता है।