भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीकृष्ण के गुण (२) [ १५५ हो सकता है। भोग की तीन वस्तुएँ हैं—सुन्दर स्त्रियाँ, अलंकार एवं धन। ये सभी श्रीकृष्ण के महलों में विद्यमान थीं, जिससे शिव, कुबेर, इन्द्र, आदि की कल्पना तक परास्त हो जाती थी। लेशमात्र दुःख भी कभी श्रीकृष्ण का स्पर्श नहीं कर सकता। एक बार कुछ गोपियों ने याज्ञिक ब्राह्मणों की पत्नियों के पास जाकर कहा था, "हे ब्राह्मणपत्नियो ! तुम यह जान लो कि श्रीकृष्ण को दुःख की गन्ध भी नहीं छू सकती। उन्हें न हानि की, न ग्लानि की, न अपयश की और न भय, उद्वेग या उत्पात की कोई चिन्ता है। वे तो बस व्रजांगनाओं से घिरे हुए उनके साथ रासरस का दिन-रात उपभोग करते रहते हैं। ३६. भक्तसुहृद भक्तिभाव से तुलसी का एक पत्ता अथवा अंजलि भर जल को अपर्ण करने से भी भक्तवत्सल भगवान् अपने आत्मा को भक्तों के हाथ बेच देते हैं। श्रीकृष्ण भक्तसुहृद हैं, यह भीष्म के साथ उनके युद्ध में भलीभाँति प्रकट हुआ है। जिस समय भीष्म बाणों की शय्या पर मरणासन्न अवस्था में पड़े थे, तो श्रीकृष्ण भी वहाँ उनके आगे उपस्थित थे। भीष्म को युद्ध का वह दृश्य स्मरण हो आया जब श्रीकृष्ण ने उन पर कृपा की थी। श्रीकृष्ण की प्रतिज्ञा थी कि वे कुरुक्षेत्र के युद्ध में किसी भी दल की ओर से अस्त्र को हाथ भी नहीं लगायेंगे, पूर्ण रूप से तटस्थ रहेंगे। अर्जुन के सारथि होते हुए भी उनका प्रण था कि वे किसी अस्त्र-शस्त्र के प्रयोग से उसकी सहायता नहीं करेंगे। परन्तु श्रीकृष्ण की इस प्रतिज्ञा को भंग कराने के लिए भीष्म ने एक दिन अर्जुन के विरुद्ध ऐसा अतुल पराक्रम प्रकट किया कि श्रीकृष्ण अपने रथ से उतरने को बाध्य हो गए। एक खण्डित रथ के पहिए को उठा कर पितामह की ओर दौड़े, मानो कोई सिंह गजराज को मारने के लिए जा रहा हो। मरण-शय्या पर इस मार्मिक दृश्य को स्मरण करके भीष्मदेव ने अपने भक्त अर्जुन के प्रति वात्सल्यवश अपनी प्रतिज्ञा भंग करने में भी संकोच न करने के लिए भगवान् श्रीकृष्ण का जय-जयकार किया। ४०. प्रेमवश्य श्रीकृष्ण भक्त के प्रेमभाव से वशीभूत हो जाते हैं। इसमें प्रेम ही प्रधान है, सेवा का प्रकार नहीं। वैसे तो कोई भी श्रीकृष्ण की पूर्ण सेवा