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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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पृष्ठ 183

१५६ ] भक्तिरसामृतसिन्धु नहीं कर सकता। वे अपने में सब प्रकार से पूर्ण एवं तृप्त हैं; अतः भक्त से किसी प्रकार की सेवा की उन्हें अपेक्षा नहीं है। श्रीकृष्ण के लिए भक्त का प्रेम और स्नेह ही उन्हें वशीभूत करता है। श्रीकृष्ण की इस प्रेम- वश्यता का एक सुन्दर उदाहरण तब अभिव्यक्त हुआ जब सुदामा विप्र उनके महल में आया। पूर्व में वह श्रीकृष्ण का सहपाठी रह चुका था; अब दरिद्रता-निवारण के लिए स्त्री की प्रेरणा से श्रीकृष्ण के पास आया था। श्रीकृष्ण ने उसका हार्दिक सत्कार किया और स्त्रियों सहित ब्राह्मण समझ कर उसका पद-प्रक्षालन किया। मित्र से मिलते हुए श्रीकृष्ण उसके साथ शैशव के प्रेमविहारों की स्मृति से प्रेमाश्रु बहाने लगे। श्रीकृष्ण की प्रेमवश्यता का एक अन्य उदाहरण श्रीमद्भागवत (१०.६.१८) में है। शुकदेव गोस्वामी परीक्षित से कहते हैं, "हे राजन् ! अपने को पकड़ने के लिए पीछे-पीछे दौड़ती माता यशोदा को पसीने से तर और बहुत श्रान्त हुआ जानकर श्रीकृष्ण स्वयं बँध गए।" बालकृष्ण अपने चपल क्रीड़ा से माता को बहुत तंग करते, इसलिए माता उन्हें बाँधना चाहती थीं। वे घर में से रस्सी ले आईं और उन्हें बाँधने लगीं। परन्तु रस्सी में गाँठ नहीं लग सकी। उन्होंने रस्सी कितनी भी बढ़ायी, पर वह छोटी ही रही। इससे उन्हें बहुत अधिक परिश्रम हुआ और शरीर से स्वेद-स्राव हो चला। उस समय श्रीकृष्ण स्वयं माता के बन्धन में आ गए। भाव यह है कि श्रीकृष्ण को प्रेम से ही बाँधा जा सकता है। भक्त उन्हें प्रेम करते हैं, इसलिए वे उनके प्रेमवश्य हैं। ४१. सर्वशुभंकर जो सदा सब का हितकारी हो, उसे सर्वशुभंकर कहते हैं। इस धराधाम से श्रीकृष्ण के अप्रकट हो जाने पर उद्धव उनकी लीलाओं का स्मरण करके कहने लगा, "अपने अद्भुत लीला-चरित से सब मुनियों को कृतार्थ किया, क्रूर राजवंशों की सारी आसुरी क्रियाओं को समाप्त किया, पुण्यात्माओं को बचाया और युद्ध में सभी क्रूरकर्मी पुरुषों को मार डाला। अतः वे सभी के लिए कल्याणकारी हैं।" ४२. प्रतापी शत्रुओं को संकट में डालने वाला प्रतापी कहलाता है। जिस समय श्रीकृष्ण इस पृथ्वी पर विद्यमान थे, तब जैसे प्रतापी सूर्य सम्पूर्ण अन्धकार को कन्दराओं की शरण में खदेड़ देता है, वैसे ही उनके शत्रुरूप उलूक उनकी दृष्टि से दूर जा छिपे।