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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

पृष्ठ 184, कुल 380 में से

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पृष्ठ 184

श्रीकृष्ण के गुण (२) [ १५७ ४३. कीर्तिमान् निर्मल चरित के कारण प्रसिद्ध पुरुष कीर्तिमान् कहलाता है । श्रीकृष्ण के यश का प्रसारण उस चन्द्रकौमुदी के समान है जो कालिमा को भी शुभ्र ज्योत्स्ना में बदल देती है । अर्थात्, यदि कृष्णभावना का सम्पूर्ण जगत् में प्रसार किया जाय तो भवरोग का उद्वेग और अन्धकार शुद्धता, शान्ति और समृद्धि की शुभ्र ज्योत्स्ना में परिणत हो जायगा । देवर्षि नारद के वीणा पर श्रीकृष्ण की कीर्ति का गान करने पर शिवजी का कण्ठ नीला न रहा । यह देखकर परपुरुष की आशंका से गौरी ने शिवजी को त्याग दिया; नीलाम्बरधारी बलराम जी ने अपने वस्त्र को श्वेत देखकर फेंक दिया; तथा यमुनाजल को दूध हुआ देखकर गोपियाँ उससे मक्खन का मन्थन करने लगीं। भाव यह है कि कृष्णभावना के प्रसार से सब कुछ शुद्ध और शुभ्र हो जाता है। ४४. रक्तलोक जो पुरुष सम्पूर्ण लोक का प्रीतिभाजन हो, उसे रक्तलोक कहते हैं । श्रीकृष्ण की लोकप्रियता का उदाहरण श्रीमद्भागवत (१.११.६) में है जब वे हस्तिनापुर से घर लौटे थे । कुरुक्षेत्र के युद्ध में द्वारका से उनकी अनुपस्थिति के कारण सारे द्वारकावासी बहुत हतप्रभ हो गए थे । फिर जब वे लौटे तो सारे निवासियों ने बड़े ही हर्षोल्लास सहित उनका अभिवादन किया और कहा, "हे नाथ ! जब आप यहाँ से चले जाते हैं तो आपके बिना एक-एक क्षण रात्रि के समान अंधकारमय, करोड़ों वर्ष के जैसा हो जाता है । हमारे लिए आपका विरह असह्य है ।" इस वाक्य से पता चलता है कि श्रीकृष्ण सम्पूर्ण देश में कितने लोकप्रिय थे । ऐसी ही घटना तब घटी जब श्रीकृष्ण उस यज्ञमण्डप में आए, जिसका आयोजन राजा कंस ने अपने ही मरण के लिए किया था । श्रीकृष्ण को पधारते देखकर सारे ऋषिवृन्द जयजयकार करने लगे । श्रीकृष्ण कुमारा- वस्था में थे, अतः सब ऋषियों ने सादर आशीर्वाद दिया । वहाँ आए देवताओं ने भी श्रीकृष्ण का स्तवन किया तथा चारों ओर से नगर की नारियों की हर्षध्वनि होने लगी । भाव यह है कि उस स्थान में ऐसा कोई नहीं था, श्रीकृष्ण जिसके अनुराग के पात्र न हों । ४५. साधुसमाश्रय यद्यपि श्रीकृष्ण परात्पर भगवान् के रूप में किसी से पक्षपात नहीं