भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१५८ ] भक्तिरसामृतसिन्धु करते, तथापि भगवद्गीता के अनुसार जो श्रद्धा-प्रेम से उनके नाम का भजन करता है, उस भक्त के प्रति उनका विशेष आकर्षण रहता है। श्रीकृष्ण के जगत् में अवतरण-काल में एक भक्त ने वह उद्गार प्रकट किया था, "हे पुरुषोत्तम ! यदि आप जगत् के कल्याण के लिए अवतरण न करते तो असुरों की भयंकर क्रियाओं के कारण न जाने सज्जनों की क्या दशा होती।" अपने आविर्भाव के प्रारम्भ से ही श्रीकृष्ण सब प्रकार के आसुरी जीवों के परम वैरी थे, यद्यपि असुरों से उनके द्वेष और भक्तों से प्रेम में भेद नहीं है, क्योंकि श्रीकृष्ण के हाथ से मरा कोई भी असुर तत्काल मुक्तिलाभ कर लेता है। ४६. नारीगणमनोहारी जिस पुरुष में विशेष गुण हों, वह सुन्दरियों के समूह को मोहित करने वाला होता है। द्वारका की महिषियों के सम्बन्ध में एक भक्त ने कहा, "साक्षात् भगवान् की सेवापरायणा द्वारका की महिषियों की महिमा का क्या कहना। भगवान् की महिमा इतनी अगाध है कि नारद आदि सब ऋषिवृन्द उनके नाम-कीर्तन से ही दिव्य रस का आस्वादन कर सकते हैं; फिर उन महिषियों का क्या कहना जो निरन्तर उनका दर्शन और सेवन करती थीं?" द्वारका में श्रीकृष्ण की १६१०८ महिषियाँ थीं। ये सभी श्रीकृष्ण के प्रति आकृष्ट रहती थीं, ठीक उसी प्रकार जैसे लोहा चुम्बक की ओर। एक भक्त का उद्गार है, "हे कृष्ण ! आप चुम्बक हैं और व्रजांगनायें लोहे जैसी हैं। आप जहाँ भी जाते हैं, वे आपके पीछे-पीछे दौड़ती हैं।" ४७. सर्व आराध्य जो सब देव-मनुष्यों के लिए सबसे पहले पूजा के योग्य हो, उसे सर्वाराध्य कहते हैं। श्रीकृष्ण ब्रह्मा, शिव आदि सब जीवों के ही नहीं, वरन् बलराम, शेष जैसे विष्णुरूपों के भी आराध्य हैं। बलदेव श्रीकृष्ण के स्वयं प्रकाश हैं, परन्तु वे भी उन्हें आराध्य मानते हैं। जब श्रीकृष्ण युधिष्ठिर के राजसूय में पधारे तो वे ऋषि, देव, सहित सारे सभासदों के आकर्षण के केन्द्र बन गए और सभी ने उनका अग्रपूजन किया। ४८. समृद्धिमन् श्रीकृष्ण वीर्य, श्री, यश, रूप, ज्ञान और वैराग्य—सभी ऐश्वर्यों में