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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

पृष्ठ 186, कुल 380 में से

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पृष्ठ 186

श्रीकृष्ण के गुण (२) [ १५६ पूर्ण हैं। उनके द्वारका-निवास के समय यदुवंश में ५६ करोड़ सदस्य थे । ये सभी श्रीकृष्ण के विश्वासपात्र और आज्ञानुचर थे। नगर में नौ लाख प्रासाद थे जिनके सारे निवासी श्रीकृष्ण को प्राणाराध्य समझते थे । श्रीकृष्ण के इस ऐश्वर्य को देखकर किसे आश्चर्य नहीं होगा । विल्वमंगल ठाकुर ने कृष्णकर्णामृत के एक श्लोक में यही उद्गार अभिव्यक्त किया है, "हे कृष्ण ! तुम्हारे वृन्दावन के ऐश्वर्य का क्या कहना । व्रजांगनाओं के चरणों के भूषण चिन्तामणि से भी बढ़कर हैं और उन्होंने पारिजात के पुष्पों का श्रृंगार धारण कर रखा है। गायें बिलकुल गोलोक धाम की सुरभि गायों जैसी हैं। अहो ! आपके ऐश्वर्य-सागर को कौन माप सकता है ।" ४६. वरीयान् जो सम्पूर्ण मान्य पुरुषों में प्रधान हो उसे वरीयान् कहते हैं। जिस समय श्रीकृष्ण द्वारका में निवास कर रहे थे, तो शिव, ब्रह्मा, इन्द्र, आदि सब देवता उनके दर्शन के लिए आते थे। एक दिन प्रतिहारी कहने लगा, "हे ब्रह्माजी—शिवजी ! कुछ देर सामने बैठकर प्रतीक्षा करें; हे देवराज ! चाटुकारी करना व्यर्थ है, चुपचाप बैठो; हे वरुण ! तुम भागो यहाँ से । ये सब देवता द्वार पर कोलाहल क्यों कर रहे हैं? अभी द्वारकानाथ को मिलने का अवकाश नहीं है ।" ५०. परमईश्वर जो स्वतन्त्र हो तथा जिसकी आज्ञा का कोई उल्लंघन न कर सके, उसे ईश्वर कहते हैं । श्रीकृष्ण की पूर्ण स्वतन्त्रता और ईश्वरत्व के सम्बन्ध में श्रीमद्- भागवत कहती है कि यद्यपि कालिय महान् अपराधी था; फिर भी श्रीकृष्ण ने उसे अपना चरणचिन्ह प्रसाद रूप में प्रदान किया, जबकि नाना प्रकार से स्तुति करने पर भी ब्रह्मा की ओर देखा तक नहीं । श्रीकृष्ण का यह विचित्र व्यवहार सर्वथा योग्य ही है क्योंकि सम्पूर्ण वैदिक शास्त्रों में उन्हें पूर्ण स्वतन्त्र कहा गया है। श्रीमद्भागवत के आदि में आए 'स्वराट्' शब्द का भी यही तात्पर्य है। परम् ब्रह्म की स्थिति ऐसी ही है । परतत्त्व चैतन्य ही नहीं है, पूर्ण स्वतन्त्र भी है । जहाँ तक सबके लिए श्रीकृष्ण की आज्ञा की दुर्लंघ्यता है, उसके सम्बन्ध में श्रीमद्भागवत (३.२.२१) में उद्धवजी विदुर से कहते हैं, "भगवान्

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