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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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पृष्ठ 187

१६० ] भक्तिरसामृतसिन्धु श्रीकृष्ण त्रिगुणमयी माया के अधीश्वर हैं। वे सम्पूर्ण ऐश्वर्यों के भोक्ता हैं, इसलिए उनके समान अथवा उनसे अधिक कोई नहीं हो सकता।" सारे लोकपाल आकर उन्हें भेंट चढ़ाते थे और अपने मुकुटों से भगवान् के चरणपीठ की वन्दना करते थे। एक भक्त बोला, “हे कृष्ण ! ब्रह्मा को सृष्टि की आज्ञा देकर और शिव को संहार की आज्ञा करके आप ही सृष्टि- संहार कर रहे हैं। आप केवल अपनी आज्ञा और अंशरूप विष्णु के द्वारा सृष्टि का पालन करते हैं। हे कंसारि ! दिशा-दिशा में खड़े सारे ब्रह्मा, शिव आदि आपके वशवर्ती हैं। ५१. सदास्वरूपसम्प्राप्त श्रीकृष्ण का स्वरूप कभी नहीं बदलता, यहाँ तक कि प्राकृत-जगत् में अवतरित होने पर भी उनका स्वरूप अविकृत रहता है। साधारण जीवों का अप्राकृत स्वरूप ढक जाता है। वे नाना देह धारण करते हुए देहात्म- बुद्धि के भेद से कर्म करते हैं। परन्तु श्रीकृष्ण का शरीर कभी नहीं बदलता। वे अपने आदि स्वरूप में ही प्रकट होते हैं; इसलिए प्रकृति के गुणों के अधीन नहीं हैं। श्रीमद्भागवत (१.११.३८) के अनुसार परमेश्वर की यह विशेषता है कि वह माया के गुणों से कभी प्रभावित नहीं होता। इसका प्रत्यक्ष उदाहरण भगवान् के शरणागत भक्त हैं जो माया से परे हो जाते हैं। माया से पार होना बड़ा कठिन है, परन्तु भगवान् के संरक्षण में स्थित सन्तपुरुष माया से पार हो जाते हैं। फिर स्वयं भगवान् के सम्बन्ध में क्या कहना है ? यद्यपि भगवान् कभी-कभी इस प्राकृत-जगत् में प्रकट होते हैं, पर प्रकृति के गुण उनका स्पर्श नहीं कर सकते। वे शुद्ध सत्त्व में स्थित रहकर पूर्ण स्वतन्त्रता से कार्य करते हैं। भगवान् का यह एक विशेष गुण है। ५२. सर्वज्ञ जो सबके मनोभाव को और सम्पूर्ण देशकाल की घटनाओं को जानता हो, उसे सर्वज्ञ कहते हैं । श्रीभगवान् की सर्वज्ञता का एक सुन्दर उदाहरण श्रीमद्भागवत (१.१५.११) में है। इसका सम्बन्ध उस घटना से है जब दुर्वासा मुनि वन में पाण्डवों के निवास पर गए थे। पूर्व योजना के अनुसार दुर्योधन ने वन में पाडवों के पास दस हजार शिष्यों के साथ दुर्वासा को अतिथिरूप में भेजा। दुर्योधन ने ऐसी व्यवस्था की जिससे दुर्वासा का दल उस समय पाण्डवों के यहाँ पहुँचे, जब पाण्डव भोजन कर चुके हों। भोजन न मिलने पर दुर्वासा