भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६२ ] भक्तिरसामृतसिन्धु ही डालते हैं। श्रीकृष्ण की अधिकांश सखियों का विवाह हो चुका था; परन्तु विवाह से पूर्व हुए श्रीकृष्ण के परिचय और उस श्रीअंग सौन्दर्य को वे भुला न सकीं, जो विवाह के बाद भी उनके लिए मनोहारी था। ५४. सच्चिदानन्द विग्रह श्रीकृष्ण का दिव्य शरीर सच्चिदानन्दमय है। सत् अर्थात् देशकाल में सर्वव्यापी और चित् अर्थात् ज्ञानमय। श्रीकृष्ण को किसी से कुछ सीखना नहीं है। वे स्वतन्त्र रूप से पूर्ण ज्ञानी हैं। आनन्द, अर्थात् अखिल रसराज। निर्विशेषवादी ब्रह्मज्योति में लीन होना चाहते हैं, जिसमें केवल सत् और चित् हैं। परन्तु श्रीकृष्ण में प्राप्त ब्रह्मसुख के मुख्यांश से वे वंचित रह जाते हैं। ब्रह्मज्योति में लीन होने के दिव्य सुख का अनुभव मोह, मिथ्या देहात्म- बुद्धि, राग, द्वेष और विषयासक्ति के विकारों से मुक्त होने पर ही होता है। ब्रह्मानुभूति के लिए यह प्रारम्भिक योग्यता है। भगवद्गीता में उल्लेख है कि प्रसन्नावस्था में स्थित हो जाना चाहिए। इसका प्रारम्भ शोक-निवृत्ति से होता है। ब्रह्मभूत पुरुष तो प्रसन्नावस्था के साधक ही हैं। उस प्रसन्नता की प्राप्ति वास्तव में श्रीकृष्ण का संग होने पर ही होती है। कृष्णभावना सर्वथा पूर्ण है, अतः निर्विशेष ब्रह्म से प्राप्त वाला सुख उसमें अन्तर्निहित (समाविष्ट) है। जो निर्विशेषवादी हैं, वे भी श्रीकृष्ण के श्यामसुन्दर रूप पर मोहित हो जाते हैं। ब्रह्मसंहिता का प्रमाण है कि ब्रह्मज्योति श्रीकृष्ण की अंगकांति है, अर्थात् केवल श्रीकृष्ण का शक्तिप्रकाश है। श्रीकृष्ण ब्रह्मज्योति के स्रोत हैं, जैसा भगवद्गीता में वे स्वयं कहते हैं। इससे निश्चय होता है कि परतत्त्व की निर्विशेष विभूति अन्तिम नहीं है; श्रीकृष्ण ही परतत्त्व की अवधि हैं। वैष्णव सम्प्रदाय इसीलिए संसिद्धि के लिए ब्रह्मज्योति में कभी लीन होना नहीं चाहते। वे श्रीकृष्ण को स्वरूप-साक्षात्कार का परम लक्ष्य समझते हैं। इसीलिए श्रीकृष्ण परम् ब्रह्म और परमेश्वर कहलाते हैं। श्रीयामुनाचार्य प्रार्थना करते हैं, "हे भगवन् ! यह जो ब्रह्माण्ड है और इसके अन्तर्गत जो कुछ देशकाल और एक-दूसरे से दस-दस गुण महत्त्व वाले प्राकृत तत्त्वों के दस आवरण, प्रकृति के तीनों गुण, गर्भोदकशायी विष्णु, क्षीरोदकशायी विष्णु, महाविष्णु, और उनसे परे परव्योम, ब्रह्म- ज्योति, तथा वैकुण्ठ-धाम हैं-ये सब के सब आप की शक्ति की विभूति- मात्र हैं।