भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीकृष्ण के गुण (२) [ १६३ ५५. सर्वसिद्धिनिषेवित सिद्धि के अनेक स्तर हैं। पूर्ण योगियों को प्राप्त सर्वोच्च प्राकृत सिद्धियाँ आठ हैं—अणिमा, गरिमा इत्यादि । ये सब प्राकृत सिद्धियाँ तथा सारी अप्राकृत सिद्धियाँ भी श्रीकृष्ण में पूर्ण रूप से रहती हैं। ५६. अचिन्त्य महाशक्ति श्रीकृष्ण सर्वव्यापी हैं, वे ब्रह्माण्ड ही में नहीं, सम्पूर्ण जीवों के हृदय में ही नहीं, वरन् अणु-अणु में विद्यमान हैं। महारानी कुन्ती ने अपने स्तवन में श्रीकृष्ण की इस चिन्तनातीत दिव्य शक्ति का उल्लेख किया है। कुन्ती देवी से वार्तालाप करते-करते ही वे उत्तरा के गर्भ में प्रविष्ट हो गए, जो अश्वत्थामा के ब्रह्मास्त्र से आक्रान्त थी। श्रीकृष्ण ब्रह्मा, शिव आदि को भी मोहित कर सकते हैं और सम्पूर्ण शरणागत भक्तों के अमंगलमय प्रारब्ध को विध्वंस करने में भी समर्थ हैं। ये उनकी अचिन्त्य शक्तियों के कुछ उदाहरण मात्र हैं। अस्तु, श्रील रूप गोस्वामी भगवान् श्रीकृष्ण की वन्दना करते हुए कहते हैं, "सम्पूर्ण अपरा प्रकृति नराकृति श्रीकृष्ण की छायामात्र है। उन्होंने असंख्य गौ, गौवत्स और गोपबालकों के रूप में अपना विस्तार किया है और फिर उन सब में चतुर्भुज नारायण रूप में प्रकट हुए। उन्होंने करोड़ों ब्रह्माओं को आत्मविद्या प्रदान की है, इसलिए वे ब्रह्माण्ड के अधी- श्वरों के ही नहीं, वरन् चराचर जीवमात्र के आराध्य हैं। उन भगवान् को मैं प्रणाम करता हूँ।" जब श्रीकृष्ण इन्द्र को हरा कर स्वर्ग से पारिजात हरण करके ले गए तो नारद जी उसके पास आकर उसे धिक्कारने लगे, "हे महेन्द्र ! श्रीकृष्ण ने ब्रह्मा, शिव आदि को हरा रखा है, फिर तुझ जैसे तुच्छ देवता किस कोटि में हैं ?" नारदजी के इस परिहास से इन्द्र हँस पड़ा। उनके वाक्य में यह पुष्टि है कि श्रीकृष्ण ने ब्रह्मा, शिव तथा इन्द्र को सर्वथा मोहित कर दिया था। फिर और जीवों के सम्बन्ध में श्रीकृष्ण की शक्ति का तो कहना ही क्या है । भक्त के पापफल को दूर करने में श्रीकृष्ण की शक्ति का विवरण ब्रह्मसंहिता में है, "इन्द्र से लेकर इन्द्रगोप कीड़े तक जीवमात्र प्रारब्ध भोग रहा है। परन्तु श्रीकृष्ण की कृपा से कृष्णभक्त इनसे छूट जाता है।" यह उस समय सिद्ध हो गया जब श्रीकृष्ण अपने मृत गुरुपुत्र को वापस लाने यमालय गए। गुरु ने उनसे गुरुदक्षिणा के रूप में उनके मृत पुत्र को लौटा लाने को कहा था। अतः श्रीकृष्ण तुरन्त यमलोक को गए और यमराज को