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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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श्रीकृष्ण के गुण (२) [ १६५ का वध किया है; बलरामरूप में हल को धारण किया है; बुद्ध अवतार में पशुओं को हिंसा से बचाया है, तथा कल्कि अवतार* में सारे नास्तिकों का संहार किया है।" श्रीकृष्ण के ये केवल कुछ प्रधान अवतार हैं; श्रीमद्भागवत से ज्ञात होता है कि श्रीकृष्ण के विग्रह से सागर में तरंगों के समान निरन्तर असंख्य अवतार होते रहते हैं। सागर की तरंगों को कोई नहीं गिन सकता; इसी प्रकार भगवत्-वपु से होने वाले अवतारों की गणना भी असम्भव है। ५६. हत-अरि-गतिदायक मुक्ति का एक नाम अपवर्ग भी है। यह उस पवर्ग के विपरीत है, जिसका अर्थ है नाना प्रकार के प्राकृत दुःख । पवर्ग में पाँच अक्षर हैं- प, फ, ब, भ और म । ये निम्नलिखित पाँच दुःखों के वाचक हैं-'प'-पराभव (पराजय) । संसार में अस्तित्व के लिए संघर्ष करते हुए हमें पराजय ही पराजय का सामना करना पड़ रहा है। वास्तव में हमारा काम जन्म, मृत्यु, जरा और रोग को जीतना है। माया के कारण इन दुःखों पर विजय सम्भव न होने के कारण हमें निरन्तर परास्त होना पड़ रहा है। अगला अक्षर 'फ' फेनिल से है। यह उस फेन का नाम है जो बहुत थक जाने पर मुख में आ जाता है (जैसा घोड़ों में प्रायः देखने में आता है)। 'ब' अर्थात् बन्धन । 'भ'-भीति (भय) तथा म - मृत्यु । अतः पवर्ग अस्तित्व के लिए संघर्ष और परिणाम में होने वाले पराभव, श्रान्ति, बन्धन, भय और मृत्यु का वाचक है। अपवर्ग उसे कहते हैं जिससे ये सब दुःख दूर हो जायें। श्रीकृष्ण को इस अपवर्ग अथवा मुक्तिपथ का दाता कहा जाता है। निर्विशेषवादियों और श्रीकृष्ण के शत्रुओं के लिए मुक्ति का अर्थ ब्रह्मज्योति में लीन हो जाना है। वे श्रीकृष्ण का तिरस्कार करते हैं; पर श्रीकृष्ण इतने अतिशय दयामय हैं कि अपने शत्रुओं और निर्विशेषवादियों को भी मुक्ति देते हैं। इस सम्बन्ध में उल्लेख है, "हे मुरारे ! देवताओं के द्वेषी असुर आपकी सेना का भेदन तो नहीं कर सके, परन्तु मित्रमण्डल को भेद कर अमृतत्व को अवश्य प्राप्त हो गए हैं, यह कितना विचित्र है।" यहाँ 'मित्र' शब्द श्लिष्ट है। मित्र का अर्थ सूर्य भी होता है और सखा भी। श्रीकृष्ण के साथ युद्ध करने वाले असुर उनकी सेना का भेदन करना चाहते थे; परन्तु ऐसे करने में वे युद्ध में मारे गए और मित्र, अर्थात् सूर्यमण्डल का भेदन कर गए अथवा ब्रह्मज्योति में लीन हो गए। यहाँ सूर्यमण्डल का

  • लेखक के ग्रन्थ भगवत् सन्देश (श्रीमद्भागवत) भाग १ में इन सब अवतारों का विवरण है।