भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६६ ] भक्तिरसामृतसिन्धु उदाहरण हैं, क्योंकि वह स्वयंप्रकाश वैकुण्ठ लोकों वाले परव्योम के समान ही नित्य देदीप्यमान् रहता है । असुरगण मारे गए और श्रीकृष्ण के सैन्यबल को भेदे बिना ही ब्रह्मज्योति के मित्र परिवेश में प्रविष्ट हो गए । इसी दया के कारण श्रीकृष्ण शत्रु के भी उद्धारक कहलाते हैं । ६०. आत्मारामगणाकर्षी ऐसे अनेक उदाहरण हैं जब श्रीकृष्ण ने शुकदेव और चारों कुमार जैसे महान् जीव-मुक्त पुरुषों को भी आकृष्ट कर लिया । इस सम्बन्ध में कुमार कहते हैं, “कैसा आश्चर्य है कि इच्छा से रहित पूर्ण मुक्त परमहंस अवस्था में होने पर भी हम राधाकृष्ण की लीला का आस्वादन करने को उत्कण्ठित हैं ।” ६१. असाधारण लोला वारिधि 'बृहद्वामन पुराण' में भगवान् स्वयं कहते हैं, “यद्यपि मेरी अनेक मनोहर लीलायें हैं, पर गोपियों के साथ की रासलीला का स्मरण होते ही न जाने क्यों मेरा मन उसके लिए फिर आतुर हो उठता है ।” एक भक्त की वाणी है, “मैं लक्ष्मीपति नारायण को जानता हूँ और अन्यान्य अनेक अवतारों को भी जानता हूँ । इन सभी अवतारों के चरित मनोहारी हैं; फिर भी न जाने क्यों साक्षात् श्रीकृष्ण का रासलीलारस अद्भुत रूप में मेरे दिव्य आनन्द को बढ़ा रहा है ।” ६२. श्रीकृष्ण प्रियभक्तों से परिवेष्टित हैं श्रीकृष्ण कभी अकेले नहीं रहते । कृष्ण का अर्थ है उनके नाम, गुण, यश, उनके मित्र, उनकी सामग्री, उनका परिकर, इत्यादि सभी कुछ । राजा सदा मन्त्रियों, सचिवों, सेनाध्यक्षों तथा अन्य बहुत से व्यक्तियों से घिरा रहता है । इसी प्रकार श्रीकृष्ण भी निर्विशेष नहीं हैं । विशेषतः अपनी वृन्दावन लीला में वे गोपीजनों, गोपबालकों, माता, पिता तथा सम्पूर्ण वृन्दावन वासियों से परिवेष्टित रहते हैं । श्रीमद्भागवत (१०.३१.१५) में गोपीजन शोक करती हैं, “हे कृष्ण ! तुम दिन में जब वृन्दावन में गोचारण के लिए जाते हो तो हमारा पल- पल युग के समान बड़ी कठिनता से बीतता है । फिर संध्या समय जब तुम लौटते हो तो तुम्हारी मुख-माधुरी पर आकृष्ट हुईं हम उसे निरन्तर निहारा करती हैं । ऐसे में पलकों का कदाचित् गिर जाना असह्य हो जाता है; हमें