भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीकृष्ण के गुण (२) [ १६७ लगता है विधाता जड़बुद्धि है; वह तुम्हारे दर्शन के योग्य नेत्र बनाना भी नहीं जानता ।" भाव यह है कि गोपियों को पलकों को गिरने से क्षोभ होता है, क्योंकि इससे श्रीकृष्ण के दर्शन में तनिक बाधा आती है। इससे प्रतीत होता है कि श्रीकृष्ण के लिए गोपियों का प्रेम इतना अतिशय तथा भावमय था कि उनका क्षण भर का विरह भी वे सहन नहीं कर सकती थीं । फिर श्रीकृष्ण को देखने पर भी उन्हें क्षोभ होता । यह अद्भुत पहेली है । एक गोपी श्रीकृष्ण से अपने हृदय का उद्गार प्रकट करती हुई कहती है, "आपके संग में ब्रह्मरात्रि* भी हमारे लिए क्षणमात्र के समान बीत जाती है।" ब्रह्मा के एक दिन का अनुमान भगवद्गीता के इस वाक्य से लगाया जा सकता है— "मानवी गणना के अनुसार एक हजार चतुर्युग से ब्रह्मा का एक दिन बनता है और इसी अवधि की उसकी रात्रि है" (पृ० १७) गोपियों ने कहा कि उन्हें इस अवधि की रात्रि मिल जाय तो वह भी श्रीकृष्ण का संग करने के लिए पर्याप्त न होगी । ६३. वेणुमाधुर्य श्रीमद्भागवत (१०.३५.१५) में गोपीजन यशोदा मैया से कहती हैं, "जब तुम्हारा बालक अपनी वंशी बजाता है तो परम विद्वान् महान् ब्रह्मा, शिव, इन्द्र आदि तक मोहित हो जाते हैं। उस वेणुरव से उनका सिर विनम्र भाव से अवनत हो जाता है और वे एकाग्रचित्त हो जाते हैं।" 'विदग्धमाधव' में श्रील रूप गोस्वामी श्रीकृष्ण की वंशीध्वनि का वर्णन करते हुए कहते हैं, "श्रीकृष्ण के वेणुनाद ने आश्चर्यपूर्वक शिवजी डिण्डिम डमरू को बजने से रोक दिया । उसी नाद ने कुमार आदि ऋषियों को ध्यान से विचलित किया है; सृष्टि-कार्य के लिए कमल पर आसीन ब्रह्माजी चकित हो उठे हैं और सम्पूर्ण लोकों को धारण करने वाले शेष- नाग झूमने लगे हैं, उसी वंशीध्वनि के कारण जो इस ब्रह्माण्ड के आवरण का भेदन करके वैकुण्ठ-जगत् में जा पहुँची है । ६४. श्रीकृष्ण का असमोर्ध्व रूपमाधुर्य श्रीमद्भागवत (३.२.१२) में उद्धव विदुर से कहते हैं, "हे विदुर ! जिस समय श्रीकृष्ण इस धरा पर प्रकट होकर अपनी आत्ममाया की शक्ति
- ४,३०,००,००,००० सौर वर्ष ब्रह्मा के बारह घण्टे अथवा एक रात्रि के तुल्य हैं ।