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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

पृष्ठ 195, कुल 380 में से

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पृष्ठ 195

१६८ ] भक्तिरसामृतसिन्धु का प्रकाश कर रहे थे, उनका शरीर माधुर्यातिशय के कारण परम अद्भुत था। उनकी आत्ममाया द्वारा प्रकटित ऐश्वर्य सब के लिए आकर्षक था। उनकी श्रीअंग माधुरी इतनी अतुलित थी कि उनके लिए शरीर पर अलंकार धारण करना व्यर्थ था। वस्तुतः आभूषणों से विभूषित होने के स्थान पर श्रीकृष्ण का सौन्दर्य ही उन्हें विभूषित रहा था।" श्रीकृष्ण के श्रीअंग-माधुर्य और वेणु के आकर्षण के सम्बन्ध श्रीमद्- भागवत (१०.२६.४०) में गोपियां उनसे कहती हैं, "हे कृष्ण ! यह सत्य है कि हममें तुम्हारे लिए उपपति का सा भाव है, परन्तु तुम्हारी वंशी ध्वनि को सुनकर त्रिभुवन में ऐसी कौन सी स्त्री है जो पतिव्रतधर्म से विचलित न हो जाय ? स्त्रियों की तो बात ही क्या, पाषाण हृदय मनुष्य भी तुम्हारे वेणुरव से द्रवित हो जाते हैं। तुम्हारी मधुर मुरली की तान और मनोहारी रूपमाधुरी से तो वृन्दावन गाय, हिरन, पक्षी और वृक्ष भी मुग्ध और पुल- कित हो उठे हैं। श्रील रूप गोस्वामी रचित ललितमाधव में उल्लेख है, "एक दिन श्रीकृष्ण को रत्नजड़ित दर्पण में अपने सुन्दर रूप की छाया दृष्टिगोचर हुई। इस पर वे कहने लगे, "अहो ! यह रूप कैसा अद्भुत एवं अपूर्व है। यद्यपि यह मेरा ही रूप है, फिर भी इसे देखकर मैं राधारानी के समान ललचाता हुआ स्वयं इसका आलिंगन करके आनन्दित होना चाहता हूँ।" इस वाक्य से सिद्ध होता है कि श्रीकृष्ण और उनकी छाया एकतत्त्व है। उनमें और उनकी छाया में अथवा उनमें और उनके चित्र में अन्तर नहीं है। ऐसी श्रीकृष्ण की दिव्य स्थिति है। उपरोक्त वाक्यों में श्रीकृष्ण में स्थित कतिपय रस-सागरों और गुणों का विवरण है। श्रीकृष्ण के दिव्य गुण सागर के समान हैं। सागर की ओर छोर का माप कोई नहीं कर सकता; पर फिर भी एक विन्दु को चखने से सम्पूर्ण सागर के स्वरूप को जाना जा सकता है। इसी भांति ये सारे वाक्य श्रीकृष्ण की दिव्य अवस्था और गुणों का दिग्दर्शन कराते हैं। श्रीमद्भागवत (१०.१४.७) में ब्रह्माजी कहते हैं, "हे भगवन् ! इस धरा पर प्रकट होकर आपने जो-जो अचिन्त्य गुण, सौन्दर्य और लीलायें प्रकट की हैं, उनकी गणना करने में कौन समर्थ हो सकता है ? आपके सम्बन्ध में तो कोई अनुमान नहीं लगा सकता। यह सम्भव है कि जन्म- जन्मान्तर में प्राकृत वैज्ञानिक सम्पूर्ण जगत् के परमाणुओं अथवा आकाश के तारों को गिनने में सफल हो जायें; परन्तु फिर भी हे आनन्दनिधान ! आपके दिव्य गुणों की गणना असम्भव ही रहेगी।"