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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

पृष्ठ 196, कुल 380 में से

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पृष्ठ 196

अध्याय २३ श्रीकृष्ण का स्वरूप श्रील रूप गोस्वामी लिखते हैं कि यद्यपि श्रीकृष्ण अनन्त रसराज और सम्पूर्ण नायकों में शिरोमणि हैं, फिर भी उन्हें तीन प्रकार से भक्तों से अपेक्षा है। भक्त के भाव के अनुसार भगवान् का पूर्णतम पूर्णतर और पूर्ण— इन तीन रूप रूपों में आस्वादन होता है। सम्पूर्ण गुणों को प्रकाशित करने वाला स्वरूप विद्वानों द्वारा पूर्णतम कहा जाता है। सम्पूर्ण गुणों से कुछ कम गुणों को प्रकट करने वाला स्वरूप पूर्णतर और थोड़े गुणों का प्रदर्शन स्वरूप पूर्ण कहलाता है। इस प्रकार श्रीकृष्ण का आस्वादन पूर्णता की तीन श्रेणियों में होता है। श्रीकृष्ण गोलोक-वृन्दावन में पूर्णतम हैं, द्वारका में पूर्णतर हैं और मथुरा में पूर्ण हैं। श्रीकृष्ण का स्वरूप चार प्रकार का है । धीरोदात्त, धीरललित, धीरप्रशान्त तथा धीरोद्धत । श्रीकृष्ण अखिल चिद्गुणों और लीलाओं के भण्डार हैं; उस उस प्रकार की लीलाओं के अनुसार ही यहाँ उनकी चतु- विधता कही गई है, अतः इसमे कोई विरोध (असंगति) नहीं होता । धीरोदात्त जो स्वभाव से ही गम्भीर, विनयी, क्षमाशील, दयामय, दृढ़व्रती, निरभिमान, उत्तम, शक्तिशाली और शरीर से आकर्षक हो, वह धीरोदात्त नायक कहलाता है। इस सन्दर्भ में देवराज इन्द्र का यह वाक्य महत्त्वपूर्ण है, “हे नाथ ! मैंने अवश्य आपका महान् अपराध किया है, परन्तु आपकी अद्भुत शक्ति, भक्तवत्सलता, गोवर्धन-धारण करने से प्रकट हुई दृढ़ता, श्रीअंग-सौन्दर्य तथा भक्त और अपराधियों की स्तुति से प्रसन्न हो जाने का विस्मापक गुण—इन सब को देख कर मेरी बुद्धि और वाणी स्तब्ध रह जाती हैं।” देवराज इन्द्र का यह वाक्य श्रीकृष्ण में धीरोदात्त नायक के सब

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