भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१७०] भक्तिरसामृतसिन्धु लक्षणों को सिद्ध करता है। अनेक विद्वानों ने भगवान् रामचन्द्र को भी धीरोदात्त माना है, परन्तु श्रीराम के सम्पूर्ण गुण भगवान् श्रीकृष्ण में आ जाते हैं। धीरललित जो स्वभाव से परिहास करने में अति पारंगत, नित्य नवयौवन से युक्त, कलाओं में चतुर और निश्चिन्त हो उसे धीरललित नायक कहा जाता है। ऐसा नायक प्रायः प्रेयसी के परवश रहता है। श्रीकृष्ण के स्वरूप में इस धीरललित गुण का वर्णन श्रीमद्भागवत में है। यज्ञपत्नी ने वृन्दावन में अपनी सखी से कहा, “एक दिन जब सखियों के साथ राधारानी उद्यान में विश्राम कर रही थीं, तो श्रीकृष्ण वहाँ आ पहुँचे और वहीं सबके सामने रात्रि में राधारानी की रतिकला का वर्णन करने लगे। राधाजी ने लज्जा से नेत्र नीचे की ओर कर लिए। इस अवसर पर श्रीकृष्ण राधाजी के स्तनों पर बड़ी पाण्डित्यपूर्ण चित्रकारी करने लगे।” इस प्रकार धीरललित रूप में श्रीकृष्ण ने गोपियों के साथ यौवन का विहार किया। साधारणतः नाटककार धीरललित नायक के रूप में कामदेव का नाम लेते हैं, परन्तु श्रीकृष्ण के स्वरूप में धीरललित के लक्षण अधिक पूर्ण हैं। धीरप्रशान्त शान्त प्रकृति से युक्त, क्लेश सहन करने में समर्थ, विवेचन तथा विनय, आदि गुणों वाला नायक धीरप्रशान्त कहलाता है। श्रीकृष्ण के धीरप्रशान्तत्व का प्रकाश पाण्डवों से उनके व्यवहार में हुआ था। अपने पाण्डवों के श्रद्धा-प्रेम के कारण वे उनके सारथि, परामर्शदाता, मित्र, दूत और अंगरक्षक तक बने। विष्णुभक्ति का ऐसा ही फल होता है। युधिष्ठिर के समक्ष धर्म का उपदेश करते हुए श्रीकृष्ण ने प्रगाढ़ पाण्डित्य का प्रकाश किया, परन्तु अनुज के रूप में उनकी वाणी अतिशय विनीत थी, जिससे शरीर-सौन्दर्य बढ़ गया। उनके नेत्रों की भंगी और बोलने के प्रकार से स्पष्ट था कि वे नीति को प्रकाशित करने में पारंगत हैं। कदाचित विद्वज्जन युधिष्ठिर को भी धीरप्रशान्त कहते हैं। धीरोद्धत जो बहुत ईर्ष्यालु, (अहंकारी), सहज ही क्रुद्ध होने वाला, चंचल