भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
पृष्ठ 198, कुल 380 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्रीकृष्ण का स्वरूप [ १७१ चित्त तथा आत्मश्लाघा करता हो उसे विद्वान् धीरोद्धत कहते हैं। श्रीकृष्ण के स्वरूप के ये गुण भी हैं। यवनराज कालयवन को पत्र लिखते समय श्रीकृष्ण ने उसे पापात्मा मण्डूक कहा था। उन्होंने उसे परामर्श दिया कि वह अविलम्ब किसी अन्धे कुएँ में निवास जा ढूँढे, क्योंकि कृष्ण नामक काला सर्प ऐसे सभी पापी मेंढकों को खाने को तैयार बैठा है। श्रीकृष्ण ने काल- यवन को याद दिलाया कि वे अपनी दृष्टिमात्र से सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को भस्म कर सकते हैं। श्रीकृष्ण के उपरोक्त वाक्य में मात्सर्य का दोष प्रतीत होता है; परन्तु देश, काल और लीला के अनुसार होने पर इसे भी महान् गुण माना जाता है। श्रीकृष्ण के धीरोद्धत गुणों की महानता का रहस्य यह है कि वे उनका प्रयोग केवल अपने भक्तों की रक्षा के लिए ही करते हैं। अर्थात्, भक्तियोग के आदान-प्रदान में प्रयुक्त अवगुण भी गुण बन जाते हैं। भीमसेन को भी धीरोद्धत नायक कहा गया है। हिरन के रूप में लड़ने आए एक असुर को ललकारते हुए श्रीकृष्ण कहते हैं, "मुझ कृष्ण रूप गजराज से हार कर या तो युद्ध से भाग जा अथवा यम को याद कर ।" श्रीकृष्ण की यह निरंकुशता उनके उत्कृष्ट गुणों की विरोधी नहीं है, क्योंकि परम पुरुष होने के कारण उनके चरित्र में सभी कुछ हो सकता है। भगवान् में प्राप्त होने वाले विरोधी गुणों के सम्बन्ध में 'कूर्म पुराण' में उल्लेख है कि श्रीभगवान् न तो स्थूल हैं, न अणु हैं, वर्णहीन होने पर भी श्यामवर्ण हैं। उनके नेत्र रक्तवर्ण हैं तथा वे सर्वशक्तिमान् और सम्पूर्ण ऐश्वर्यों से युक्त हैं। भगवान् में विरुद्ध धर्मों का होना आश्चर्यदायक नहीं है; प्रतीत होने पर भी उनके गुणों में वास्तव में कोई विरोध नहीं है। आचार्यों के मुख से श्रीकृष्ण के गुणों का तत्त्व जानना चाहिए । तब यह ज्ञात हो जायगा कि भगवान् की प्रबल इच्छा-शक्ति के अनुसार ये गुण किस प्रकार कार्य करते हैं। 'महावराह पुराण' में प्रमाण है कि भगवान् के सारे दिव्य शरीर और अंश शाश्वत् हैं। वे हानोपादनरहित पूर्णतः अप्राकृत और ज्ञानमय हैं तथा परमानन्द से परिपूर्ण हैं। 'वैष्णव तन्त्र' के एक वाक्य में कहा है कि भगवान् के सब शरीर और अंश अट्ठारह प्राकृत दोषों से नित्य मुक्त हैं, क्योंकि वे सच्चिदानन्दमय हैं। विष्णुतन्त्र में इन अट्ठारह दोषों का उल्लेख है—मोह, तन्द्रा, भ्रम, रूखापन, काम, चंचलता, मद, मात्सर्य, हिंसा, खेद, परिश्रम,