भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
DevanagariHindipublished380 पृष्ठ
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१७२ ] भक्तिरसामृतसिन्धु असत्य, क्रोध, आकांक्षा, आशंका, पराधीनता, विषमता, शठता तथा ब्रह्माण्ड पर अधिकार करने की इच्छा । उपरोक्त सब वाक्यों के सम्बन्ध में यह समझना चाहिए कि महा- विष्णु प्राकृत् जगत् में समस्त अवतारों के उद्गम हैं। परन्तु व्रजेन्द्रनन्दन अधिक माधुर्यभर होने के कारण उस महाविष्णु के भी मूल हैं। इसके समर्थन में ब्रह्मसंहिता कहती है, "जिस विष्णु के निश्वास काल में उसके रोमकूपों से असंख्य ब्रह्माण्ड प्रकट-अप्रकट होते रहते हैं, वह महान् विष्णु भी जिन का कलाविशेष मात्र है, उन आदि पुरुष भगवान् गोविन्द को मैं नमस्कार करता हूँ।"