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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

श्रीकृष्ण का स्वरूप [ १७१ चित्त तथा आत्मश्लाघा करता हो उसे विद्वान् धीरोद्धत कहते हैं। श्रीकृष्ण के स्वरूप के ये गुण भी हैं। यवनराज कालयवन को पत्र लिखते समय श्रीकृष्ण ने उसे पापात्मा मण्डूक कहा था। उन्होंने उसे परामर्श दिया कि वह अविलम्ब किसी अन्धे कुएँ में निवास जा ढूँढे, क्योंकि कृष्ण नामक काला सर्प ऐसे सभी पापी मेंढकों को खाने को तैयार बैठा है। श्रीकृष्ण ने काल- यवन को याद दिलाया कि वे अपनी दृष्टिमात्र से सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को भस्म कर सकते हैं। श्रीकृष्ण के उपरोक्त वाक्य में मात्सर्य का दोष प्रतीत होता है; परन्तु देश, काल और लीला के अनुसार होने पर इसे भी महान् गुण माना जाता है। श्रीकृष्ण के धीरोद्धत गुणों की महानता का रहस्य यह है कि वे उनका प्रयोग केवल अपने भक्तों की रक्षा के लिए ही करते हैं। अर्थात्, भक्तियोग के आदान-प्रदान में प्रयुक्त अवगुण भी गुण बन जाते हैं। भीमसेन को भी धीरोद्धत नायक कहा गया है। हिरन के रूप में लड़ने आए एक असुर को ललकारते हुए श्रीकृष्ण कहते हैं, "मुझ कृष्ण रूप गजराज से हार कर या तो युद्ध से भाग जा अथवा यम को याद कर ।" श्रीकृष्ण की यह निरंकुशता उनके उत्कृष्ट गुणों की विरोधी नहीं है, क्योंकि परम पुरुष होने के कारण उनके चरित्र में सभी कुछ हो सकता है। भगवान् में प्राप्त होने वाले विरोधी गुणों के सम्बन्ध में 'कूर्म पुराण' में उल्लेख है कि श्रीभगवान् न तो स्थूल हैं, न अणु हैं, वर्णहीन होने पर भी श्यामवर्ण हैं। उनके नेत्र रक्तवर्ण हैं तथा वे सर्वशक्तिमान् और सम्पूर्ण ऐश्वर्यों से युक्त हैं। भगवान् में विरुद्ध धर्मों का होना आश्चर्यदायक नहीं है; प्रतीत होने पर भी उनके गुणों में वास्तव में कोई विरोध नहीं है। आचार्यों के मुख से श्रीकृष्ण के गुणों का तत्त्व जानना चाहिए । तब यह ज्ञात हो जायगा कि भगवान् की प्रबल इच्छा-शक्ति के अनुसार ये गुण किस प्रकार कार्य करते हैं। 'महावराह पुराण' में प्रमाण है कि भगवान् के सारे दिव्य शरीर और अंश शाश्वत् हैं। वे हानोपादनरहित पूर्णतः अप्राकृत और ज्ञानमय हैं तथा परमानन्द से परिपूर्ण हैं। 'वैष्णव तन्त्र' के एक वाक्य में कहा है कि भगवान् के सब शरीर और अंश अट्ठारह प्राकृत दोषों से नित्य मुक्त हैं, क्योंकि वे सच्चिदानन्दमय हैं। विष्णुतन्त्र में इन अट्ठारह दोषों का उल्लेख है—मोह, तन्द्रा, भ्रम, रूखापन, काम, चंचलता, मद, मात्सर्य, हिंसा, खेद, परिश्रम,

१७२ ] भक्तिरसामृतसिन्धु असत्य, क्रोध, आकांक्षा, आशंका, पराधीनता, विषमता, शठता तथा ब्रह्माण्ड पर अधिकार करने की इच्छा । उपरोक्त सब वाक्यों के सम्बन्ध में यह समझना चाहिए कि महा- विष्णु प्राकृत् जगत् में समस्त अवतारों के उद्गम हैं। परन्तु व्रजेन्द्रनन्दन अधिक माधुर्यभर होने के कारण उस महाविष्णु के भी मूल हैं। इसके समर्थन में ब्रह्मसंहिता कहती है, "जिस विष्णु के निश्वास काल में उसके रोमकूपों से असंख्य ब्रह्माण्ड प्रकट-अप्रकट होते रहते हैं, वह महान् विष्णु भी जिन का कलाविशेष मात्र है, उन आदि पुरुष भगवान् गोविन्द को मैं नमस्कार करता हूँ।"

[ १७५ ] अध्याय २४ श्रीकृष्ण के वैशिष्ट्य भगवान् श्रीकृष्ण के विविध ऐश्वर्यों का वर्णन करके श्रील रूप गोस्वामी उनके निम्नलिखित गुणों और आठ माधुरियों का वर्णन करते हैं : शोभा, विलास, माधुर्य, मंगल्य, स्थैर्य, तेज, लालित्य तथा उदारता । ये आठ गुण सामान्यतः महापुरुषों के लक्षण माने जाते हैं । शोभा दीनों पर दया, शौर्य, स्पर्धा, उत्साह, दक्षता तथा सत्य—इन गुणों से शोभित व्यक्ति महापुरुष माना जाता है । गोवर्धन-धारण-लीला में सभी शोभायें श्रीकृष्ण में प्रकट हुई थीं । उस समय सम्पूर्ण वृन्दावन धाम पर इन्द्र के मेघ मूसलाधार वर्षा का उत्पात कर रहे थे । पहले श्रीकृष्ण स्वर्ग का नाश करने के लिए उद्यत हुए, परन्तु फिर देवराज की तुच्छता का विचार करके इन्द्र पर दयार्द्र हो गए । श्रीकृष्ण के क्रोध को कोई नहीं सह सकता; अतः इन्द्र का प्रतिकार करने के स्थान पर अपने प्रिय व्रजवासियों की रक्षा के लिए गोवर्धन-धारण करके उन्होंने उनके लिए अपनी दया ही प्रकट की । विलास जो पुरुष सदा प्रसन्न रहता है और मुस्कराते हुए बात करता है, उसे विलासी समझना चाहिए । श्रीकृष्ण में यह गुण उस समय प्रकट हुआ जब वे कंस के यज्ञमण्डप में पधारे । वहाँ वर्णन है कि मत्तनयन श्रीकृष्ण ने किसी के प्रति अविनय का प्रदर्शन किए बिना मल्लों के मध्य में प्रवेश किया जब उन्होंने उन पर स्थिर दृष्टिपात किया तो ऐसे लगे मानो गजराज वनस्पति को उखाड़ रहा हो । इस प्रकार स्मितकान्ति से युक्त श्रीकृष्ण वीरतापूर्वक रंगमंच पर चढ़ गए । माधुर्य जिसकी चेष्टा आदि स्पृहणीय हों, उसे मधुर कहते हैं । श्रीकृष्ण के

१७४ ] भक्तिरसामृतसिन्धु माधुर्य का एक उदाहरण श्रीमद्भागवत में इस प्रकार है, "यमुना के किनारे राधारानी की प्रतीक्षा करते हुए श्रीकृष्ण कदम्ब की माला बना रहे थे। तभी राधारानी का वहाँ आगमन हुआ और उस समय मुरारि ने उन पर अतिशय मधुर दृष्टि डाली।" मंगल्य जो सब अवस्थाओं में सबका विश्वासपात्र हो, उसे मंगल्य कहते हैं। इस सम्बन्ध में श्रील रूप गोस्वामी कहते हैं कि दानव भी श्रीकृष्ण की विश्वसनीयता पर निर्भर कर रहे थे, क्योंकि वे जानते थे कि न्याययुक्त कारण के बिना श्रीकृष्ण भी आक्रमण नहीं करेंगे। अतः वे निर्भय होकर द्वार खुले रखते थे । यद्यपि देवताओं को दानवों से भय था; परन्तु श्रीकृष्ण हमारे रक्षक हैं, यह सोचकर वे भय की अवस्था में भी क्रीड़ामत रहते थे। जिन्होंने कभी वैदिक विधि का आचरण नहीं किया, वे लोग भी यह जानकर निश्चिन्त हो रहे हैं कि श्रीकृष्ण केवल श्रद्धा-भक्ति को ही स्वीकार करते हैं। इसलिए वे कृष्णभावना के परायण होकर सम्पूर्ण उद्वेगों से मुक्त हो गए हैं। भाव यह है कि देवताओं से लेकर असभ्य मनुष्य तक सभी भगवान् श्रीकृष्ण की अहैतुकी कृपा पर निर्भर कर सकते हैं। स्थैर्य नाना विघ्न उपस्थित होने पर भी अपने निश्चय पर अचल रहना स्थैर्य है। बाणासुर-वध के प्रसंग में श्रीकृष्ण में स्थिरता प्रकट हुई है । बाण के हजार हाथ थे, परन्तु श्रीकृष्ण उन्हें एक-एक करके काटते गए। यह बाण शिव और दुर्गा का बड़ा भक्त था। अतः उसका वध होता देखकर शिव और दुर्गा श्रीकृष्ण पर बहुत क्रुद्ध हुए, परन्तु श्रीकृष्ण ने उनकी ओर ध्यान ही नहीं दिया। तेज जो सबके चित्त को प्रभावित कर सकता है, उसे तेजस्वी कहते हैं। श्रीकृष्ण के तेज के सम्बन्ध में श्रीमद्भागवत (१०.४३.१७) में शुकदेव गोस्वामी परीक्षित महाराजा से कहते हैं, "हे राजन् ! श्रीकृष्ण मल्लों के लिए वज्र के समान भयंकर हैं; साधारण मनुष्यों के लिए नरश्रेष्ठ; स्त्रियों के लिए मूर्तिमान् कामदेव; गोप-गोपियों के लिए परम बन्धु; दुष्ट राजाओं के लिए दण्ड देने वाले शासक; नन्द-यशोदा के लिए शिशु; भोजराज कंस

श्रीकृष्ण के वैशिष्ट्य [ १७५ के लिए साक्षात् मृत्यु; मन्दों और मूर्खों के लिए पाषाण; योगियों के लिए परतत्त्व; तथा वृष्णियों के लिए परम देव हैं। इस प्रकार की प्रभविष्णु अवस्था में श्रीकृष्ण ने अग्रज बलराम के साथ उस मण्डप में प्रवेश किया।" कंस के यज्ञ में अलग-अलग लोगों को श्रीकृष्ण का अलग-अलग रूपों में दर्शन हुआ, क्योंकि वे उनसे परस्पर भिन्न-भिन्न रसों में सम्बन्धित थे । भगवद्गीता में उल्लेख है कि श्रीकृष्ण से अपने सम्बन्ध के अनुसार ही प्राणीमात्र को उनका दर्शन होता है । कभी-कभी कुछ विद्वान् अपमान आदि न सहन करने को तेज (प्रभाव) कहते हैं। श्रीकृष्ण में यह विशेषता तब प्रकट हुई जब कंस नन्द- महाराज को अपमानित कर रहा था और वसुदेवजी ने श्रीकृष्ण से कंस को मार डालने का आग्रह किया था तब श्रीकृष्ण कंस पर कुलटा के समान दृष्टिपात करते हुए उस पर कूदने को उद्यत थे । ललित जिसकी चेष्टा में शृंगार की प्रचुरता रहती है, उसे ललित कहते हैं। श्रीकृष्ण में यह गुण दो रूपों में था—कभी वे नाना प्रकार के चिह्नों से राधारानी का शृंगार करते और कभी जब अरिष्ट आदि असुरों का वध करने को उद्यत होते तो कटि में मेखला को अच्छी प्रकार से कसते थे । उदार जो किसी को आत्मदान तक कर सकता है, वह उदार है । श्रीकृष्ण से अधिक उदार दूसरा कौन हो सकता है, जो भक्तों को अपना पूर्ण दान करने को सदा तत्पर रहते हैं। भगवान् चैतन्य महाप्रभु के रूप में तो जो भक्त नहीं है, उसे भी श्रीकृष्ण आत्मदान करके मुक्त कर देते हैं । यद्यपि श्रीकृष्ण सब से स्वतन्त्र हैं, फिर भी वे धर्मोपदेश के लिए गर्गाचार्य पर आश्रित हैं, युद्धविद्या के लिए सात्यकी पर निर्भर करते हैं और सद्परामर्श के लिए मित्रवर उद्धव उनके सहायक हैं।

अध्याय २५ श्रीकृष्णभक्त जो निरन्तर कृष्णभावनाभावित रहता है, वह कृष्णभक्त कहलाता है। श्रील रूप गोस्वामी कहते हैं कि श्रीकृष्ण के सम्पूर्ण पूर्ववर्णित दिव्य गुण कृष्णभक्त में भी पाये जाते हैं। कृष्णभक्तों की दो कोटियाँ हैं—जो दिव्य धाम में प्रवेश के लिए भक्ति के साधक हैं और दूसरे जो भक्ति की संसिद्धि को प्राप्त हो चुके हैं। जिसके अन्तर में भलीभाँति श्रीकृष्ण के लिए रति का उदय हो गया है और जो प्राकृत अंतरालों (विघ्नों) से मुक्त तो नहीं हुआ है परन्तु भगवद्धाम में प्रवेश के योग्य है, उसे साधक कहते हैं। साधक वह है जो कृष्णभावनाभावित भक्ति का सेवन करता है। इस कोटि के भक्त का विवरण श्रीमद्भागवत (११.२.४६) में है। वहाँ उल्लेख है कि जिसका भगवान् में अनन्य श्रद्धा-प्रेम है, जो कृष्णभक्तों से मैत्री करता है, अज्ञानियों को भक्ति में लगा कर उन पर कृपा करता है तथा अभक्तों की ओर उपेक्षा का भाव रखता है, वह भक्तियोग के सेवन की अवस्था में है। जब भगवान् के लीला-चरित को सुनने से अश्रुधारा बहने लगे तो समझना चाहिए कि उस जल-वर्षण से संसाराग्नि शान्त हो जायगी। जिसका शरीर पुलकित और रोमांचित हो उठता है, वह संसिद्धि के निकट है। बिल्वमंगल ठाकुर आदि भक्तियोग के साधक हैं। जब कोई भक्त भक्तियोग के साधक से कभी भी परिश्रम का अनुभव नहीं करता और सदा कृष्णभावनाभावित क्रियाओं के परायण रहता हुआ श्रीकृष्ण से अपने सम्बन्ध में निरन्तर रसास्वादन करता है, तब वह सिद्ध कहलाता है। इस सिद्धि-प्राप्ति के दो प्रकार हैं—एक भक्ति के साधन द्वारा और दूसरे भक्ति के पूरे विधि-विधान का आचरण किए बिना ही अहैतुकी भगवत्कृपा से सिद्ध हो जाना। साधनसिद्ध भक्त के सम्बन्ध में श्रीमद्भागवत (३.१५.२५) में यह वाक्य है, "भवरोग के मिथ्या अहंकार से मुक्त पुरुष अथवा उत्तम योगी वैकुण्ठ धाम में प्रवेश का

श्रीकृष्णभक्त [ १७७ अधिकारी हो जाता है। वह योगी वैधीभक्ति का निरन्तर आचरण करने से परमानन्द को प्राप्त होता है और फलस्वरूप भगवान् की विशेष कृपा का पात्र होता है। यमराज उस भक्त के पास भी फटकने में डरता है।" इससे हम उत्तम भक्ति की शक्ति का अनुमान लगा सकते हैं, विशेषतः जब भक्त-गोष्ठी में भगवान् की लीलाओं की चर्चा होती है। परस्पर भगवत्-यश की चर्चा करने से वे भक्त भाव से द्रवित हो जाते हैं और बहुत से सात्त्विक विकार भी उनके शरीर पर प्रकट हो उठते हैं। भक्ति के पथ पर उन्नति के अभिलाषी को इन भक्तों के चरणचिह्नों का अनुसरण करना चाहिए। प्रह्लाद महाराज ने कहा है कि उत्तम भक्तों को प्रणाम किए बिना कोई भी भक्ति की संसिद्धि को प्राप्त नहीं हो सकता। मारकण्डेय ऋषि आदि विद्वान् साधनभक्ति के द्वारा ही संसिद्धि को प्राप्त हुए। कृपासिद्धि का उदाहरण श्रीमद्भागवत में यज्ञपत्नियों के उपाख्यान में है। भगवान् श्रीकृष्ण की कृपा से अपनी पत्नियों को भगवत्प्रेम में विभोर हुआ देखकर ब्राह्मण कहने लगे, "कैसा आश्चर्य है कि यज्ञोपवीत आदि कोई भी संस्कार हुए बिना, गुरुकुल में निवास किये बिना, ब्रह्मचर्य, तप, त्याग, मीमांसा, शौच अथवा शुभ कर्मों का आचरण किए बिना ही इन स्त्रियों को श्रीकृष्णकृपा से महायोगियों के लिए भी दुर्लभ दृढ़ भक्ति प्राप्त हुई है, जबकि संस्कार आदि से युक्त होने पर भी हममें उसका अभाव है।" नारदजी भी शुकदेव गोस्वामी को इसी प्रकार सम्बोधित करते हैं, "हे शुकदेव ! तुमने कभी गुरु के पास विद्याध्ययन नहीं किया, फिर भी दिव्य ज्ञान को प्राप्त हो गये हो। तुमने कभी कठोर तप नहीं किया, तथापि कैसा आश्चर्य है कि तुमने भगवत्प्रेम की परमावस्था को पा लिया है।" शुकदेव गोस्वामी और यज्ञपत्नियां कृपासिद्ध भक्तों के प्रतीक हैं। नित्यसिद्ध श्रीकृष्ण के समान सत्, चित्, आनन्द आदि गुणों को प्राप्त तथा अपनी प्रेमसेवा से श्रीकृष्ण का आकर्षण करने वाले भक्त नित्यसिद्ध हैं। जीव दो प्रकार के होते हैं—नित्यसिद्ध और नित्यबद्ध। भेद यह है कि नित्यसिद्ध विस्मृत में बिना निरन्तर कृष्णभावनावभावित रहते हैं, जबकि नित्यबद्ध श्रीकृष्ण से अपने सम्बन्ध को भुला बैठते हैं। 'पद्मपुराण' में वर्णित भगवान् और सत्यभामा देवी के संवाद में नित्यसिद्धों का विवरण है। भगवान् कहते हैं, "हे देवी ! मैं इस धराधाम

१७८ ] भक्तिरसामृतसिन्धु पर ब्रह्मा और इन्द्र की प्रार्थना से अवतीर्ण हुआ हूँ। सारे यदुवंशी मेरे नित्य पार्षद हैं। हे भामिनि ! वे मेरे से कभी वियुक्त नहीं होते; मेरे ये अंश मेरे ही समान शक्तिशाली हैं। वे दिव्य गुणों से युक्त हैं, इसलिए मुझे अतिशय प्रिय हैं और मैं भी उनका प्रियतम हूँ।" जो कोई भी पार्षदों सहित भगवान् श्रीकृष्ण की नर लीला को सुनकर हर्षित होता है, वह अवश्य नित्यसिद्ध है। श्रीमद्भागवत (१०.१४.३२) में कहा है, “अहो ! नन्द, गोप आदि वृन्दावनवासियों के सौभाग्य का क्या कहना, साक्षात् परम ब्रह्म उनके मित्र जो ठहरे।" इसी प्रकार श्रीमद्भागवत (१०.२६.१०) में जब श्रीकृष्ण ने गोवर्धन उठा लिया तो उनके आश्रित गोप विस्मय से चकित होकर नन्द महाराज से पूछने लगे, “हे गोपेन्द्र ! क्या कारण हैं कि हमारा श्रीकृष्ण में प्रगाढ़ अनुराग है और वे भी हमसे प्रेम करते हैं ? क्या इसका अर्थ यह नहीं कि वे सबके अन्तर्यामी परमात्मा हैं ?" सम्पूर्ण वृन्दावनवासी गोप और द्वारकावासी यादव श्रीकृष्ण के नित्य- सिद्ध भक्त हैं। जब श्रीभगवान् अपनी कृपा से इस पृथ्वी पर अवतरित होते हैं तो लीला में सहायता करने के लिए उनके भक्त भी साथ आते हैं। ये साधारण बद्धजीव नहीं हैं, वरन् भगवान् के नित्यसिद्ध शाश्वत् पार्षद हैं। जब श्रीकृष्ण का अवतार होता है तो वे नर लीला करते हैं, उसी प्रकार यदुवंशी और व्रजवासी भी साधारण मनुष्यों के समान क्रीड़ा करते हैं। परन्तु इससे उन्हें साधारण नहीं समझना चाहिए; वे भगवान के समान ही मुक्त हैं। 'पद्मपुराण' के उत्तरखण्ड में उल्लेख है, “जैसे भगवान् राम संकर्षण के अंश* लक्ष्मण और प्रद्युम्न के अंश भरत के साथ अवतरित होते हैं, उसी प्रकार भगवान् के दिव्य लीलारस में सम्मिलित होने के लिए व्रज के गोप और द्वारका के यदुवंशी भी श्रीकृष्ण के साथ प्रकट होते हैं। जब भगवान् अपने दिव्यधाम को वापस लौटते हैं तो पार्षद भी यथा स्थान लौट जाते हैं। अतएव इन नित्यसिद्ध वैष्णवों का जन्म कर्मबन्धन के अनुसार नहीं हुआ करता।" भगवद्गीता में जैसा भगवान् ने स्वयं कहा है, उनका जन्म और

  • नाना अवतारों और अंशों का विस्तृत विवरण लेखक के 'श्रीचैतन्य महाप्रभु का शिक्षामृत' नामक ग्रन्थ में देखें।

श्रीकृष्णभक्त [ १७६ कर्म पूर्ण रूप से लोकोत्तर (दिव्य) है। इसी प्रकार भगवद्भक्तों के जन्म- कर्म भी दिव्य होते हैं। जैसे अपने को श्रीकृष्ण से एक समझना अपराध है, वैसे ही नन्द-यशोदा आदि पार्षदों से अपना अभेद मानना भी अपराध है। हमें स्मरण रखना चाहिए कि ये नित्यसिद्ध लोकोत्तर जीव हैं, जो कभी बद्ध नहीं होते। शास्त्र में उल्लेख है कि कंसारि श्रीकृष्ण में चौसठ दिव्य गुण हैं और श्रीकृष्ण के पार्षद नित्यसिद्धों में भी पहले पचपन गुण निश्चित रूप से रहते हैं। ये भक्त भगवान् से शान्त, दास्य, सख्य, वात्सल्य तथा माधुर्य इन पाँच भिन्न-भिन्न रसों में सम्बन्ध रखते हैं। श्रीकृष्ण से ये सम्बन्ध नित्य हैं, इसलिए नित्यसिद्ध भक्त को वैधीभक्ति के अनुष्ठान से संसिद्धि के लिए साधन नहीं करना पड़ता। वे नित्य श्रीकृष्ण की सेवा करने के योग्य हैं।

अध्याय २६ प्रेम के उद्दीपन जो श्रीकृष्ण के प्रति प्रेम को उद्दीप्त करते हैं वे उद्दीपन विभाव कहलाते हैं, जैसे भगवान् श्रीकृष्ण के दिव्य गुण, असाधारण चेष्टा, शृंगार, मुस्कराहट, श्रीअंग की सौरभ, वस्त्र, माला; वंशी, शृंग, वेत्र, नूपुर, शंख, चरणचिह्न, वृन्दावन आदि लीलास्थल, उनकी प्रिया तुलसी, कृष्णभक्त, तथा उनकी स्मृति के दिवस। कृष्ण-स्मरण का एक दिन एकादशी है। उस दिन सारे भक्त उपवास रखकर अहोरात्र भगवान् की कीर्ति का गान करते हैं। श्रीकृष्ण के दिव्य गुण, असाधारण चेष्टा और मधुर मुस्कान श्रीकृष्ण के दिव्य गुणों की तीन कोटियाँ हैं—कायिक, वाचिक और मानसिक। श्रीकृष्ण की वय, उनका दिव्य श्रीअंग, सौंदर्य तथा मृदुता उनके कायिक गुण हैं। श्रीकृष्ण और उनके शरीर में भेद नहीं है, इसलिए उनके कायिक गुण साक्षात् उन्हीं के स्वरूप हैं। ये भक्तों के प्रेम का उद्दीपन करते हैं, इसीलिए उन्हें उस प्रेम का अलग से कारण बताया गया है। श्रीकृष्ण के गुणों से आकृष्ट होना स्वयं श्रीकृष्ण से ही आकृष्ट होना है, क्योंकि यथार्थ में श्रीकृष्ण और उनके गुणों में कुछ भी भेद नहीं है। श्रीकृष्ण का नाम भी कृष्ण है, यश भी कृष्ण और परिकर भी कृष्ण है। श्रीकृष्ण के प्रेम को उद्दीप्त करने वाली उनसे सम्बन्धित प्रत्येक वस्तु कृष्ण है। परन्तु हमारी जानकारी के लिए इनका अलग विचार किया गया है। श्रीकृष्ण अखिलरसामृतमूर्ति (आलम्बन) हैं; अतः कृष्णप्रेम के उद्दीपन भिन्न प्रतीत होते हुए भी वास्तव में श्रीकृष्ण से भिन्न नहीं हैं। कृष्ण के नाम, यश, गुण आदि कृष्णप्रेम के आलम्बन और उद्दीपन दोनों हैं। श्रीकृष्ण की वय कौमार, पौगण्ड और कैशोर—इस प्रकार तीन

प्रेम के उद्दीपन [ २८१

प्रकार की है। उनके आविर्भाव से छठे वर्ष के प्रारम्भ का काल कौमार कहलाता है, छठे वर्ष के आरम्भ से दसवें वर्ष तक पौगण्ड अवस्था रहती है तथा दसवें से सोलहवें वर्ष तक कैशोर रहता है। सोलहवें वर्ष के बाद श्रीकृष्ण यौवन में प्रवेश करते हैं, जिसके बाद श्रीकृष्ण की वय में परिवर्तन नहीं होता। श्रीकृष्ण की दिव्य लीलाएँ प्राधान्यतः कौमार, पौगण्ड और कैशोर अवस्था में सम्पादित होती हैं। नन्द-यशोदा से उनकी वात्सल्यरसमयी लीला कौमार में हुई; गोपबालकों से सख्यरस का प्रकाश पौगण्ड अवस्था में हुआ और कैशोर में गोपियों से उनका प्रेमविलास है। श्रीकृष्ण की वृन्दावनलीला उनके पन्द्रहवें वर्ष तक पूर्ण हो जाती है। आगे की लीला वे मथुरा और द्वारका में करते हैं। श्रील रूप गोस्वामी भक्तिरसामृतसिन्धु में अखिल रसों के आश्रय के रूप में श्रीकृष्ण का विशद वर्णन करते हैं, जिसका सार इस प्रकार है। श्रीकृष्ण के कैशोर को तीन भागों में विभाजित किया जा सकता है—आद्य, मध्य तथा शेष कैशोर। श्रीकृष्ण के कैशोर का आरम्भ होने पर, अर्थात् ग्यारहवें वर्ष के आदि में उनका श्रीअंग कुछ इतना उज्ज्वल हो जाता है कि प्रेम के उद्दीपक का काम करता है इसी प्रकार नयनों में अरुणिमा छा जाती है और शरीर पर रोमावली प्रकट होने लगती है। श्रीकृष्ण के इस आदि कैशोर का वर्णन करते हुए वृन्दावन में कुन्दलता ने अपनी सखी से कहा, "हे सखि ! मैंने अभी-अभी श्रीकृष्ण के विग्रह में एक अपूर्व सुषमा स्फुरित होती देखी है। उनके शरीर की श्यामल‌ता इन्द्र- नीलमणि की कान्ति का अपहरण कर रही है, नेत्रों में अरुणच्छवि है और शरीर पर रोमराजी उदित हो रही है। इन लक्षणों के उदय ने उन्हें असमोध्वं माधुरी प्रदान की है।" इस सन्दर्भ में श्रीमद्भागवत (१०.२१.५) में शुकदेव गोस्वामी महा- राज परीक्षित से कहते हैं, “गोपियों का मन श्रीकृष्ण के चिन्तन में तन्मय हो गया था। वे ध्यान में देखतीं कि श्रीकृष्ण ने नटवर वेष धारण किया है और भूमि पर अपने चरणचिह्नों को अंकित करते हुए वन में प्रवेश कर रहे हैं। श्रीकृष्ण सिर पर मोरपिच्छ और कर्णों में कर्णिकार धारण किए हुए हैं। पीताम्बर और वैजयन्ती माला से विभूषित हैं। इस प्रकार वंशी- वादन करते हुए श्रीकृष्ण की कीर्ति का गोपबालक गान कर रहे हैं।" गोपियाँ नित्य इसी ध्यान का अभ्यास करती थीं। कभी-कभी गोपीजन श्रीकृष्ण के नखाग्रों की कोमलता, भ्रूवों के

१८२ ] भक्तिरसामृतसिन्धु नर्तन और पान चबाने से रक्तवर्ण हुई दन्तावली का ध्यान करतीं। गोपी कहती है, “हे सखि ! देखो, अधारि ने कैसा अभिनव सौन्दर्य धारण किया है। उनकी भ्रुवों में कामदेव के बाण सी चपलता और वक्रता है, नखाग्र कोमल पत्तों के समान मृदु हैं और दन्तपंक्ति रक्त है, मानो वे क्रुद्ध हों। यह रूप देखकर कौन स्त्री आकृष्ट होकर इस माधुरी पर सर्वस्व खो बैठने से भीतशंकित न होगी ?” श्रीकृष्ण की रूपमाधुरी का वर्णन स्वयं वृन्दावन की अधिष्ठात्री वृन्दादेवी ने भी किया है। उसने श्रीकृष्ण से कहा, “हे माधव ! तुम्हारी अभिनव स्मित ने गोपियों के मन को ऐसा मोह लिया है कि वे अपने भावों को अभिव्यंजित करने में भी समर्थ नहीं रही हैं। वे इतनी मुग्ध हो चुकी हैं कि किसी से कुछ कह तक नहीं सकतीं। लगता है मानों तुम्हारा दर्शन कर उन्होंने अपने प्राणों पर जलांजलि दे दी है, अर्थात् जीने की आशा ही छोड़ दी है।” वैदिक पद्धति के अनुसार मृत प्राणी पर जलांजलि छोड़ी जाती है। वृन्दा के वाक्य का अभिप्राय है कि श्रीकृष्ण की माधुरी से अति- शय मुग्ध हुई गोपियाँ अपने मन का भाव अभिव्यक्त करने में समर्थ न रहीं, इसलिये उन्होंने आत्महत्या का निश्चय कर लिया। जब श्रीकृष्ण मध्य कैशोर अर्थात् तेरह-चौदह वर्ष की आयु में पदार्पण करते हैं, तो दोनों जंघाओं, दोनों बाहुओं और वक्षस्थल में कोई अभूतपूर्व सौन्दर्य आ जाता है और मूर्ति तो बस मधुरिमामयी हो जाती है। इस वयधर्म में श्रीकृष्ण की जांघें गजतुण्ड को लजाती हैं, वक्षःस्थल मरकतमणि के कपाट से मित्रता करना चाहता है। भुजदण्ड अर्गला को तिरस्कृत करते हैं। श्रीकृष्ण की इस अद्भुत रूपमाधुरी का वर्णन भला कौन कर सकता है ? इन सब में भी श्रीकृष्ण मन्द-मन्द हँसी, चंचल नेत्र और त्रिभुवनविमोहन गति का सर्वाधिक वैशिष्ट्य हैं। ये इस वय के विशिष्ट लक्षण जो ठहरे। इस सम्बन्ध में एक श्लोक में उल्लेख है कि इस अवस्था के प्रवेश काल में श्रीकृष्ण में ऐसे अपूर्व रूप का विकास हुआ कि उनके चंचल नेत्र कामदेव के खिलौने बन गए तथा मृदु मुस्कान सद्योप्रस्फुटित कमलदल से भी अतिशय हो गई। यही नहीं, उनके उन्नत मनोहर संगीत का नाद कुलवधुओं के पातिव्रत को भंग करने वाला हो गया। इसी अवस्था में श्रीकृष्ण ने हास-परिहास, रासलीला और गोपियों के साथ यमुना तट पर स्थित निकुंज में विहार का आस्वादन किया। इस सम्बन्ध में एक श्लोक इस प्रकार है, “सम्पूर्ण वृन्दावनधाम

प्रेम के उद्दीपन [ १८३ श्रीकृष्ण और गोपियों के चरणचिह्नों से अंकित है । कहीं मोरपंख व्याप्त हो रहे हैं तो कहीं-कहीं कुंजों में सुखद शय्या सजी हुई है और कहीं गोविन्द और गोपियों के परस्पर नृत्य करने से बालुका इकट्ठी हो गई है।” बाकी ये कतिपय वे विलास हैं जो वृन्दावन में श्रीकृष्ण द्वारा प्रकटित लीला में हुए । इस अवस्था में श्रीकृष्ण के आकर्षण का वर्णन करते हुए एक गोपी कहती है, “हे सखि ! देख कैसे अकस्मात् कृष्णमेघ के भीतर माधुर्य प्रवाह- रूप प्रचण्ड सूर्य का उदय हो रहा है, जो हमारे पतिव्रतधर्म रूपी चन्द्रमा को मन्द किए दे रहा है । श्रीकृष्ण के लिए हमारा अनुराग इतना अतिशय प्रबल हो चला है कि हमारे विवेकरूपी कुमुद को सुखाए डाल रहा है। हम नहीं जानतीं कि हम पतिव्रता रहें या श्रीकृष्ण के लावण्य की शिकार हो जायें । हे सखि ! लगता है हमारे जीवन की कुछ भी आशा नहीं रही है ।” ग्यारहवें वर्ष के प्रारम्भ से पन्द्रहवें वर्ष के अन्त तक के शेष कैशोर के आने पर निश्चय ही शरीर का सौन्दर्य पहले से उत्कर्ष को प्राप्त होता है तथा भुजाओं, पैरों और जांघों में त्रिवली की अभिव्यक्ति होती है । उस समय श्रीकृष्ण का वक्षःस्थल मरकतमणि के विशाल पर्वत की शोभा को हरता है, भुजाएँ इन्द्रनीलमणि के स्तम्भों से तिरस्कृत करती हैं और कटि की त्रिवली के सामने यमुना की तरंगें तुच्छ प्रतीत होती हैं तथा जांघें कदलीदल से भी अतिशय सुगढ़ हो जाती हैं ।” एक गोपी बोली, “इस सम्पूर्ण अप्रतिम श्रीअंग माधुर्य धारी श्रीकृष्ण का विलक्षण सौन्दर्य है। इसलिए मैं उन्हीं के स्मरण में निमग्न रहती हूँ, क्योंकि वे सब असुरों को मारने वाले हैं ।” इस श्लोक का भाव इस प्रकार है । गोपियाँ श्रीकृष्ण के लिए अपने आकर्षण की तुलना असुरों के आक्रमण से कर रही हैं । श्रीकृष्ण के प्रति अपने आकर्षण के उपचार के लिए भी वे श्रीकृष्ण को ही याद करती हैं, इस आशा से कि वे सब असुरों के हन्ता हैं, इसलिए अवश्य सहायता करेंगे । वे द्विविधा में पड़ी हैं, क्योंकि एक ओर तो वे श्रीकृष्ण के माधुर्य से आकृष्ट है और दूसरी ओर चाहती हैं कि श्रीकृष्ण इस आकर्षण रूपी असुर को दूर करें । इसी शेष कैशोर को नव यौवन कहा गया है । कैशोर के अन्त में सब गोपियों ने कहा, “श्रीकृष्ण कामदेव के आकर्षण को हराने वाले हैं, अतः नव वधुओं के धैर्य के सेतु को तोड़ देते हैं। श्रीकृष्ण का श्रीअंग

३. पश्चिम विभाग: मुख्य भक्ति रस (शान्त, प्रीति, सख्य, वात्सल्य, मधुर)

१८४ ] भक्तिरसामृतसिन्धु तारुण्य इतना मधुर हो चला है कि मानो परमोच्च कलाविलास हो । सुन्दर मयूरों के समान नाचते हुए उनके नेत्रों ने कुशल नर्तकों की शोभा का भी अपहरण कर लिया है। अतः श्रीकृष्ण की माधुरी सर्वथा अनुपम है।" इसीलिए विद्वान् इस समय उनके शरीरवय को नवयौवन कहते हैं। इस अवस्था में गोपियों के साथ रास आदि लीलाओं का अतिशय प्राधान्य रहता है। प्रेमविलास की ये क्रीड़ाएँ हैं- दूतीस्तुति क्रिया, अनुनय (प्रणय), कलह, प्रेमी के पास जाना, निकट बैठना, विच्छेद और सन्धि । इन छः प्रेमविलासों के साम्राज्य का विस्तार करके राजा के रूप में श्रीकृष्ण उसका संचालन करते हैं। कहीं वे युवतियों से कलह करते हैं, कहीं तोते के नख चुभाते हैं, कभी गोपी-मिलन को जाते हैं तो कभी गोपों के माध्यम से गोपियों की शरण में जाने के लिए सन्धि करते हैं । गोपियों का एक वृन्द श्रीकृष्ण को सम्बोधित करते हुए कहने लगा, “हे कृष्ण ! तुम्हारा यह कैशोर गुरु बनकर आज सुन्दर युवतियों को सखियों के द्वारा सुनकर दूतियों के समय अनुनय करने की, रात्रि में पतियों को धोखा देकर तुमसे निकुंजों में मिलने की, गुरुजनों की बात न सुनने की, वंशीध्वनि को सुनने के लिए कान लगाए रखने की और प्रेम के सभी रहस्यों की शिक्षा दे रहा है।" यद्यपि श्रीकृष्ण ने पांच वर्ष की आयु में भी ऐसे नवयौवन की शक्ति का प्रकाश किया है, परन्तु योग्य वय से रहित होने के कारण विद्वान् उसका वर्णन नहीं करते। श्रीकृष्ण के सम्पूर्ण अंग सर्वथा निर्दोष एवं सुगढ़ थे, यही उनके सौन्दर्य का कारण है। श्रीकृष्ण में प्राप्त अंगों के इस यथायोग्य सन्निवेश का वर्णन इन शब्दों में है, "हे कंसारि श्रीकृष्ण ! बड़ी बड़ी आँखों वाला तुम्हारा मुख, मरकतमणि के सदृश उन्नत वक्षस्थल, स्तम्भ जैसे भुजदण्ड तथा क्षीण कटि आदि किस मृगनयनी के चित्त का हरण नहीं करेंगे?" श्रीकृष्ण के श्रीअंग पर विराजित विभूषणों से श्रीकृष्ण की शोभा नहीं बढ़ती, बल्कि श्रीकृष्ण की माधुरी से विभूषण ही विभूषित हो जाते हैं । जो कोमल स्पर्श को भी सहन कर सके, उसे मृदु कहते हैं । श्रीकृष्ण के सभी अंग इतने अतिशय सुकुमार थे कि नवजात पत्ते के स्पर्श से भी उनका वर्ण बदल जाता । इस कैशोर में श्रीकृष्ण की सम्पूर्ण चेष्टाएँ, वृन्दावन में रासोत्सव और दुष्टदलन के लिए ही होती थीं। वृन्दावन में श्रीकृष्ण का गोपियों के साथ क्रीड़ा करते समय कंस उनके वध के हेतु

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अपने साथियों को भेजता और श्रीकृष्ण उन्हें मारकर अपना पराक्रम प्रकट करते। श्रीकृष्ण का परिधान एवं माला सामान्यतः श्रीकृष्ण के विग्रह पर चार प्रकार के परिधान रहते हैं-- कुर्ता, धोती, पगड़ी और दुपट्टा। वृन्दावन में वे सदा रक्तवर्ण दुपट्टा, पीतवर्ण कुर्ता और सिर पर केसर रंग की पगड़ी धारण करते हैं। नाना प्रकार की धोती उनकी मधुर मुस्कान से मिल कर सखाओं का आनन्द बढ़ाती थी। श्रीकृष्ण की इस वेषभूषा को भूयिष्ठ (भ्राजमान्) कहा गया है। जैसे नाना वर्ण के वस्त्र में गजशिशु शोभित होता है, वैसे ही श्रीकृष्ण के शरीर के अंगों पर वर्ण-वर्ण के वस्त्र भ्राजमान् थे। श्रीकृष्ण के केशबन्धन, अंगराग के आलेप, माला, तिलक, चित्र, पान तथा लीलाकमल को 'आकल्प' कहते हैं। श्रीकृष्ण इस सम्पूर्ण आकल्प से निरन्तर विभूषित हैं। श्रीकृष्ण के केश-विन्यास के भी बहुत भेद हैं; कभी वे सिर के मध्य भाग में पुष्प धारण करते हैं तो कभी पृष्ठभाग में। समय-समय पर उनकी केशराशि के भिन्न-भिन्न शृंगार होते हैं। श्रीकृष्ण के अंग पर आलिप्त अंगराग सामान्यतः शुभ्र (श्वेत) वर्ण का होता है, पर केसर के संयोग से पीतवर्ण हो जाता है। श्रीकृष्ण कण्ठ में वैजयन्ती माला धारण करते हैं। वैजयन्ती में कम से कम पाँच रंग के फूल गुम्फित रहते हैं। यह सदा श्रीकृष्ण के जानुओं अथवा चरणों का स्पर्श करती रहती है। इसके अतिरिक्त अन्य अनेक पुष्पमालाएँ भी उनके सिर, कण्ठ, वक्षस्थल आदि पर शोभित रहती हैं। अंगराग और सवर्ण चन्दन के बने कलापूर्ण चित्र भी श्रीकृष्ण के विग्रह पर पाए जाते हैं। एक गोपी सखी से श्रीकृष्ण की रूप माधुरी का गुणगान कर रही थी। उनका श्यामल वर्ण, पान की अरुणिमा से शतगुणित हुई शोभा, सिर पर कुंचित केशराशि, शरीर पर कुंकुम के बिन्दु तथा ललाट पर तिलक— ये सब परम मनोहारी हैं। किरीट, कुण्डल, हार, चार परिधान, कड़े, अंगूठी, नूपुर तथा वेणु—ये सब श्रीकृष्ण के नाना अलंकार हैं। अघासुर के अरि श्रीकृष्ण अपने अनुपम किरीट, हीरे के कुण्डल, मोतियों के हार, कड़े, कसीदे के वस्त्रों और सुन्दर अंगूठियों को धारण किए हुए हैं। श्रीकृष्ण को वनमाली भी कहा जाता है, क्योंकि वे नाना पुष्पों से

१८६ ] भक्तिरसामृतसिन्धु अपना श्रृंगार करते हैं। श्रीकृष्ण का यह श्रृंगार वृन्दावन में ही नहीं था, वरन् कुरुक्षेत्र की युद्धभूमि में भी दृष्टिगोचर होता था। इन रंग-बिरंगे वस्त्रों और पुष्पों से उन्हें विभूषित देखकर ऋषिगण स्तुति करने लगे, "भगवान् श्रीकृष्ण कुरुक्षेत्र की युद्धभूमि के लिए नहीं, अपितु अपनी उपस्थिति से सारे भक्तों पर कृपा करने के लिए जा रहे हैं।" श्रीकृष्ण की बांसुरी श्रीकृष्ण की बाँसुरी इतनी अद्भुत है कि उसकी ध्वनि ने परमहंसों के ध्यान को भंग कर दिया। इस प्रकार अपनी कीर्ति का त्रिभुवन में विस्तार करके श्रीकृष्ण कामदेव को ललकार रहे थे। श्रीकृष्ण की बाँसुरी के वेणु, मुरली और वंशी—ये तीन भेद हैं। वेणु बारह अंगुल लम्बी और छः छिद्रों से युक्त होती है। दो हाथ लम्बी, मुखछिद्र सहित चार अतिरिक्त स्वरछिद्रों वाली मुरली है। इससे अतिशय मधुर ध्वनि निःसृत होती है। नौ छिद्रों से युक्त और सत्रह अंगुल लम्बी वंशी है। श्रीकृष्ण यथासमय इन सब बाँसुरियों का वादन करते हैं। श्रीकृष्ण की एक महानन्दा अथवा सम्मोहिनी नामक बड़ी वंशी भी है। उससे भी बड़ी हो तो वह आकर्षिणी कहलाती है। आनन्दिनी आकर्षिणी से भी विशाल है। यह आनन्दिनी वंशी गोपबालकों की अतिशय प्रिया है। इसका एक नाम वंसुली भी है। ये वंशियाँ मणिमयी, सुवर्णमयी और बांस की बनी होती हैं। मणिमयी वंशी संमोहिनी कहलाती है और सुवर्णमयी आकर्षिणी कही जाती हैं। श्रीकृष्ण का श्रृंग श्रीकृष्ण घोष करने के लिए श्रृंग का प्रयोग करते थे। सोने से मण्डित और मध्य में रत्नजड़ित इस वाद्य के बीच में छिद्र रहता है। इस सन्दर्भ में तारावली नामक गोपी के सम्बन्ध में श्लेष युक्त वाक्य है, जिसमें कहा गया है कि श्रीकृष्ण की वंशीरूप परम विषधर सर्प से डसी तारावली ने उपचार के लिए श्रीकृष्ण के करकमलों में स्थित श्रृंग का नादरूप दुग्ध पी लिया। परन्तु उससे विष का प्रभाव कम होने के बजाय हजार गुणा बढ़ गया। इस प्रकार श्रृंग की ध्वनि से उसकी बड़ी दुर्दशा हुई। श्रीकृष्ण के पद-नूपुरों का आकर्षण किसी गोपी ने अपनी सखी से कभी कहा, "हे सखि ! श्रीकृष्ण की

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नूपुर-ध्वनि को सुन कर मैं उनके दर्शन के लिए अधीर हो उठी । पर हाय, सामने गुरुजन खड़े थे, इसलिए बाहर न जा सकी ।" श्रीकृष्ण का शंख श्रीकृष्ण के शंख का नाम पांचजन्य है । इसका भगवद्गीता में भी उल्लेख है । कुरुक्षेत्र युद्ध से पूर्व श्रीकृष्ण ने इसका वादन किया था । कहा जाता है कि जब श्रीकृष्ण अपना शंख बजाते हैं तो असुरपत्नियों का गर्भपात हो जाता है और सुरलोक की स्त्रियों के आनन्द-मंगल का वर्धन होता है । इस प्रकार शंख का स्वर त्रिभुवन को अभिपूरित करता रहता है । श्रीकृष्ण के चरणचिह्न श्रीमद्भागवत में उल्लेख है कि जब अक्रूर ने, जो श्रीकृष्ण को रथ पर वृन्दावन से मथुरा ले गये थे, वृन्दावन की भूमि पर श्रीकृष्ण के चरण- चिह्न अंकित देखे तो उनके हृदय में प्रेम ऐसा उमड़ा कि रोमांच हो आया, आंखों से प्रेमाश्रु धारा प्रवाहित होने लगी और इसी भावोन्माद में वे रथ से कूद कर भूमि पर गिर पड़े और कहने लगे—"ओह ! ओह ! कुछ ऐसा ही उद्गार गोपियों ने भी अभिव्यक्त किया था, जब वे यमुना तट पर जा रही थीं और बालुका में श्रीकृष्ण के चरणचिह्न दृष्टि- गोचर हुए। जब श्रीकृष्ण वृन्दावन की भूमि पर चलते तो ध्वज, कुलिश, अंकुश, कमल आदि चरणचिह्न रेणिका में अंकित हो जाते । इन पर दृष्टि पड़ते ही गोपियां उन्मत्त हो गयीं । श्रीकृष्ण के लीला क्षेत्र एक भक्त कहता है, "ओह ! असमोर्ध्व सौन्दर्य वाली श्रीकृष्ण की इस लीला-स्थली के दर्शन तो दूर केवल 'मथुरा' नाम भी कान में पड़ते ही हमारे मन को आनन्द से विह्वल कर देता है ।" श्रीकृष्णप्रिया तुलसी भगवान् श्रीकृष्ण को तुलसीदल और मंजरी प्राणप्रिय हैं। तुलसी भगवान् के चरणकमलों में चढ़ायी जाती है। अतः उनकी शरण में जाने का अभिलाषी एक भक्त तुलसीदेवी से प्रार्थना करता है कि वह उसका सन्देश भगवान् के चरणों तक पहुँचा दे ।

१८८ ] भक्तिरसामृतसिन्धु श्रीकृष्णभक्त कभी-कभी किसी भगवद्भक्त को देखकर मन आनन्द से अभिभूत हो जाता है। जब ध्रुव महाराज ने नारायण के दो पार्षदों को अपने निकट आते देखा तो वे श्रद्धाभाव से तुरन्त अगवानी के लिए उठे और हाथ जोड़े उनके आगे खड़े रहे; परन्तु प्रेम-विह्वलता के कारण कुछ स्तुति नहीं कर सके । एक गोपी सुबल से कहती हैं, "हे सुबल ! मैं जानती हूँ कि कृष्ण तुम्हारे सखा हैं और तुम सदा उनके साथ हास-परिहास का आनन्द लेते हो। उस दिन मैंने देखा तुम दोनों एक दूसरे के कन्धे पर हाथ रखे हुए साथ खड़े हो और मुस्करा रहे हो। दूर से ही इस दृश्य को देखकर तुरंत मेरे नेत्र भर आए ।" श्रीकृष्ण-स्मरण के विशेष दिन श्रीकृष्ण की विविध लीलाओं से सम्बन्धित महोत्सवों के अनेक विवरण हैं। इनमें प्रधान है जन्माष्टमी-श्रीकृष्ण की आविर्भाव तिथि। यह दिवस भक्त के लिए परम ऐश्वर्यमय होता है। कभी-कभी तो अन्य मतावलम्बी भी इस मंगलमय दिन का लाभ उठा कर जन्माष्टमी महोत्सव मनाते हैं। एकादशी आदि अन्य कृष्णवासों पर भी कृष्णप्रेम उद्दीप्त होता है।

अध्याय २७ प्रेम के लक्षण (अनुभाव) भक्त के शरीर में प्रकट होकर कृष्णप्रेम को अभिव्यक्त करने वाले लक्षण अनुभाव कहलाते हैं। अनुभाव ये हैं—नाचना, लोटना, गाना, चिल्लाना, देह मोड़ना, हुंकार करना, जंभाई लेना, दीर्घ श्वास लेना, लोक की चिन्ता न करना, लार टपकना, अट्टहास करना, चक्कर आना, हिचकी आना। जब प्रेम में अद्भुत अतिशयता आ जाती है तो इन शारीरिक लक्षणों के प्रकट होने से दिव्य आनन्द की अनुभूति होती है। इन अनुभावों के दो भाग हैं—शीत और क्षेपण। जम्भाई लेना आदि शीत है तथा नाचना आदि क्षेपण हैं। नाचना गोपियों के साथ रासलीला करते हुए भगवान् श्रीकृष्ण के मुखचन्द्र को निहार कर शिवजी डिण्डिम डमरू बजाते हुए नाचने लगे और गणेशजी भी उनके साथ सम्मिलित हो गए। विलुठन श्रीमद्भागवत (३.१.३२) में विदुर की उद्धव से जिज्ञासा है, "हे सखे! अक्रूरजी सुखपूर्वक तो हैं न? वे विद्वान् और निर्मलचित्त होने के साथ ही भगवान् के भक्त भी हैं। मैंने स्वयं देखा है कि कृष्ण के प्रेम में अधीर होकर वे श्रीकृष्ण के चरणचिह्नों से अंकित भूमि पर लोट गए थे।" इसी प्रकार किसी गोपी ने श्रीकृष्ण से कहा कि उनकी अभिनव अनुरागवती राधारानी उनकी वनमाला की सुगन्ध से मत्त होकर विरहवश कठोर भूमि पर लोट-लोट कर अपने मृदु शरीर का मर्दन कर रही हैं। उच्च स्वर से गाना एक गोपी ने श्रीकृष्ण को बताया कि राधाजी उनका गुणगान कर रही

१६० ] भक्तिरसामृतसिन्धु हैं। उन्होंने सखियों को कुछ इस प्रकार मुग्ध कर लिया है कि वे पाषाणवत् जड़ हो गयी हैं, जबकि उस प्रेम से पत्थर द्रवीभूत हो चले हैं। हरेकृष्ण कीर्तन करते-करते नारदजी ऐसे चिल्लाने लगे कि नृसिंहदेव को प्रकट हुआ समझकर दानवदल भयवश तुरन्त सब दिशाओं में भाग खड़े हुए। देह मोड़ना उल्लेख है कि कभी-कभी जब वीणाधारी नारदजी तीव्र भावावेश में श्रीकृष्ण का स्मरण करते हैं तो उनका शरीर कुछ इतने वेग से मोड़ खाता है कि यज्ञोपवीत खण्डित हो जाता है। चिल्लाना एक गोपी ने श्रीकृष्ण से कहा, "हे व्रजराजकुमार ! तुम्हारी मुरली- ध्वनि को सुनकर व्याकुल हुई सुन्दरी राधा रुद्ध कण्ठ से कुररी के समान चिल्ला रही है।" हुंकार करना श्रीकृष्ण की वंशीध्वनि को सुनकर चकित हुए शंकरजी आकाश में हुंकारने लगे जिससे दानवों का विनाश हो गया और भक्तों के हृदय में आनन्दसिन्धु उमड़ आया। जंभाई लेना चन्द्रोदय होने पर कुमुद प्रस्फुटित होते हैं। इसी प्रकार जब श्रीकृष्ण राधारानी के सामने आते हैं तो राधा का मुखरूप कमल जंभाई के रूप में विकास को प्राप्त होता है। दीर्घ श्वास लेना एक श्लोक में उल्लेख है, "ललिता उस चातकी जैसी है जो केवल मेघजल को ग्रहण करती है।" यहाँ श्रीकृष्ण को श्याम मेघ की उपमा दी गई है और ललिता को उस चातकी के समान बताया है जो केवल कृष्ण- मेघ के संग के लिए उत्कण्ठित है। अलंकार में आगे कहा है, "झंझावात से मेघ के तिरोहित हो जाने के समान वह अपने दीर्घ विश्वास के कारण श्रीकृष्ण को खो बैठी, जो उसके फिर सचेत होने तक अदृश्य हो गए।"