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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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पृष्ठ 205

१७८ ] भक्तिरसामृतसिन्धु पर ब्रह्मा और इन्द्र की प्रार्थना से अवतीर्ण हुआ हूँ। सारे यदुवंशी मेरे नित्य पार्षद हैं। हे भामिनि ! वे मेरे से कभी वियुक्त नहीं होते; मेरे ये अंश मेरे ही समान शक्तिशाली हैं। वे दिव्य गुणों से युक्त हैं, इसलिए मुझे अतिशय प्रिय हैं और मैं भी उनका प्रियतम हूँ।" जो कोई भी पार्षदों सहित भगवान् श्रीकृष्ण की नर लीला को सुनकर हर्षित होता है, वह अवश्य नित्यसिद्ध है। श्रीमद्भागवत (१०.१४.३२) में कहा है, “अहो ! नन्द, गोप आदि वृन्दावनवासियों के सौभाग्य का क्या कहना, साक्षात् परम ब्रह्म उनके मित्र जो ठहरे।" इसी प्रकार श्रीमद्भागवत (१०.२६.१०) में जब श्रीकृष्ण ने गोवर्धन उठा लिया तो उनके आश्रित गोप विस्मय से चकित होकर नन्द महाराज से पूछने लगे, “हे गोपेन्द्र ! क्या कारण हैं कि हमारा श्रीकृष्ण में प्रगाढ़ अनुराग है और वे भी हमसे प्रेम करते हैं ? क्या इसका अर्थ यह नहीं कि वे सबके अन्तर्यामी परमात्मा हैं ?" सम्पूर्ण वृन्दावनवासी गोप और द्वारकावासी यादव श्रीकृष्ण के नित्य- सिद्ध भक्त हैं। जब श्रीभगवान् अपनी कृपा से इस पृथ्वी पर अवतरित होते हैं तो लीला में सहायता करने के लिए उनके भक्त भी साथ आते हैं। ये साधारण बद्धजीव नहीं हैं, वरन् भगवान् के नित्यसिद्ध शाश्वत् पार्षद हैं। जब श्रीकृष्ण का अवतार होता है तो वे नर लीला करते हैं, उसी प्रकार यदुवंशी और व्रजवासी भी साधारण मनुष्यों के समान क्रीड़ा करते हैं। परन्तु इससे उन्हें साधारण नहीं समझना चाहिए; वे भगवान के समान ही मुक्त हैं। 'पद्मपुराण' के उत्तरखण्ड में उल्लेख है, “जैसे भगवान् राम संकर्षण के अंश* लक्ष्मण और प्रद्युम्न के अंश भरत के साथ अवतरित होते हैं, उसी प्रकार भगवान् के दिव्य लीलारस में सम्मिलित होने के लिए व्रज के गोप और द्वारका के यदुवंशी भी श्रीकृष्ण के साथ प्रकट होते हैं। जब भगवान् अपने दिव्यधाम को वापस लौटते हैं तो पार्षद भी यथा स्थान लौट जाते हैं। अतएव इन नित्यसिद्ध वैष्णवों का जन्म कर्मबन्धन के अनुसार नहीं हुआ करता।" भगवद्गीता में जैसा भगवान् ने स्वयं कहा है, उनका जन्म और

  • नाना अवतारों और अंशों का विस्तृत विवरण लेखक के 'श्रीचैतन्य महाप्रभु का शिक्षामृत' नामक ग्रन्थ में देखें।