भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीकृष्णभक्त [ १७७ अधिकारी हो जाता है। वह योगी वैधीभक्ति का निरन्तर आचरण करने से परमानन्द को प्राप्त होता है और फलस्वरूप भगवान् की विशेष कृपा का पात्र होता है। यमराज उस भक्त के पास भी फटकने में डरता है।" इससे हम उत्तम भक्ति की शक्ति का अनुमान लगा सकते हैं, विशेषतः जब भक्त-गोष्ठी में भगवान् की लीलाओं की चर्चा होती है। परस्पर भगवत्-यश की चर्चा करने से वे भक्त भाव से द्रवित हो जाते हैं और बहुत से सात्त्विक विकार भी उनके शरीर पर प्रकट हो उठते हैं। भक्ति के पथ पर उन्नति के अभिलाषी को इन भक्तों के चरणचिह्नों का अनुसरण करना चाहिए। प्रह्लाद महाराज ने कहा है कि उत्तम भक्तों को प्रणाम किए बिना कोई भी भक्ति की संसिद्धि को प्राप्त नहीं हो सकता। मारकण्डेय ऋषि आदि विद्वान् साधनभक्ति के द्वारा ही संसिद्धि को प्राप्त हुए। कृपासिद्धि का उदाहरण श्रीमद्भागवत में यज्ञपत्नियों के उपाख्यान में है। भगवान् श्रीकृष्ण की कृपा से अपनी पत्नियों को भगवत्प्रेम में विभोर हुआ देखकर ब्राह्मण कहने लगे, "कैसा आश्चर्य है कि यज्ञोपवीत आदि कोई भी संस्कार हुए बिना, गुरुकुल में निवास किये बिना, ब्रह्मचर्य, तप, त्याग, मीमांसा, शौच अथवा शुभ कर्मों का आचरण किए बिना ही इन स्त्रियों को श्रीकृष्णकृपा से महायोगियों के लिए भी दुर्लभ दृढ़ भक्ति प्राप्त हुई है, जबकि संस्कार आदि से युक्त होने पर भी हममें उसका अभाव है।" नारदजी भी शुकदेव गोस्वामी को इसी प्रकार सम्बोधित करते हैं, "हे शुकदेव ! तुमने कभी गुरु के पास विद्याध्ययन नहीं किया, फिर भी दिव्य ज्ञान को प्राप्त हो गये हो। तुमने कभी कठोर तप नहीं किया, तथापि कैसा आश्चर्य है कि तुमने भगवत्प्रेम की परमावस्था को पा लिया है।" शुकदेव गोस्वामी और यज्ञपत्नियां कृपासिद्ध भक्तों के प्रतीक हैं। नित्यसिद्ध श्रीकृष्ण के समान सत्, चित्, आनन्द आदि गुणों को प्राप्त तथा अपनी प्रेमसेवा से श्रीकृष्ण का आकर्षण करने वाले भक्त नित्यसिद्ध हैं। जीव दो प्रकार के होते हैं—नित्यसिद्ध और नित्यबद्ध। भेद यह है कि नित्यसिद्ध विस्मृत में बिना निरन्तर कृष्णभावनावभावित रहते हैं, जबकि नित्यबद्ध श्रीकृष्ण से अपने सम्बन्ध को भुला बैठते हैं। 'पद्मपुराण' में वर्णित भगवान् और सत्यभामा देवी के संवाद में नित्यसिद्धों का विवरण है। भगवान् कहते हैं, "हे देवी ! मैं इस धराधाम