भारतकोश
भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

पृष्ठ 203, कुल 380 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 203

अध्याय २५ श्रीकृष्णभक्त जो निरन्तर कृष्णभावनाभावित रहता है, वह कृष्णभक्त कहलाता है। श्रील रूप गोस्वामी कहते हैं कि श्रीकृष्ण के सम्पूर्ण पूर्ववर्णित दिव्य गुण कृष्णभक्त में भी पाये जाते हैं। कृष्णभक्तों की दो कोटियाँ हैं—जो दिव्य धाम में प्रवेश के लिए भक्ति के साधक हैं और दूसरे जो भक्ति की संसिद्धि को प्राप्त हो चुके हैं। जिसके अन्तर में भलीभाँति श्रीकृष्ण के लिए रति का उदय हो गया है और जो प्राकृत अंतरालों (विघ्नों) से मुक्त तो नहीं हुआ है परन्तु भगवद्धाम में प्रवेश के योग्य है, उसे साधक कहते हैं। साधक वह है जो कृष्णभावनाभावित भक्ति का सेवन करता है। इस कोटि के भक्त का विवरण श्रीमद्भागवत (११.२.४६) में है। वहाँ उल्लेख है कि जिसका भगवान् में अनन्य श्रद्धा-प्रेम है, जो कृष्णभक्तों से मैत्री करता है, अज्ञानियों को भक्ति में लगा कर उन पर कृपा करता है तथा अभक्तों की ओर उपेक्षा का भाव रखता है, वह भक्तियोग के सेवन की अवस्था में है। जब भगवान् के लीला-चरित को सुनने से अश्रुधारा बहने लगे तो समझना चाहिए कि उस जल-वर्षण से संसाराग्नि शान्त हो जायगी। जिसका शरीर पुलकित और रोमांचित हो उठता है, वह संसिद्धि के निकट है। बिल्वमंगल ठाकुर आदि भक्तियोग के साधक हैं। जब कोई भक्त भक्तियोग के साधक से कभी भी परिश्रम का अनुभव नहीं करता और सदा कृष्णभावनाभावित क्रियाओं के परायण रहता हुआ श्रीकृष्ण से अपने सम्बन्ध में निरन्तर रसास्वादन करता है, तब वह सिद्ध कहलाता है। इस सिद्धि-प्राप्ति के दो प्रकार हैं—एक भक्ति के साधन द्वारा और दूसरे भक्ति के पूरे विधि-विधान का आचरण किए बिना ही अहैतुकी भगवत्कृपा से सिद्ध हो जाना। साधनसिद्ध भक्त के सम्बन्ध में श्रीमद्भागवत (३.१५.२५) में यह वाक्य है, "भवरोग के मिथ्या अहंकार से मुक्त पुरुष अथवा उत्तम योगी वैकुण्ठ धाम में प्रवेश का