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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

पृष्ठ 202, कुल 380 में से

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पृष्ठ 202

श्रीकृष्ण के वैशिष्ट्य [ १७५ के लिए साक्षात् मृत्यु; मन्दों और मूर्खों के लिए पाषाण; योगियों के लिए परतत्त्व; तथा वृष्णियों के लिए परम देव हैं। इस प्रकार की प्रभविष्णु अवस्था में श्रीकृष्ण ने अग्रज बलराम के साथ उस मण्डप में प्रवेश किया।" कंस के यज्ञ में अलग-अलग लोगों को श्रीकृष्ण का अलग-अलग रूपों में दर्शन हुआ, क्योंकि वे उनसे परस्पर भिन्न-भिन्न रसों में सम्बन्धित थे । भगवद्गीता में उल्लेख है कि श्रीकृष्ण से अपने सम्बन्ध के अनुसार ही प्राणीमात्र को उनका दर्शन होता है । कभी-कभी कुछ विद्वान् अपमान आदि न सहन करने को तेज (प्रभाव) कहते हैं। श्रीकृष्ण में यह विशेषता तब प्रकट हुई जब कंस नन्द- महाराज को अपमानित कर रहा था और वसुदेवजी ने श्रीकृष्ण से कंस को मार डालने का आग्रह किया था तब श्रीकृष्ण कंस पर कुलटा के समान दृष्टिपात करते हुए उस पर कूदने को उद्यत थे । ललित जिसकी चेष्टा में शृंगार की प्रचुरता रहती है, उसे ललित कहते हैं। श्रीकृष्ण में यह गुण दो रूपों में था—कभी वे नाना प्रकार के चिह्नों से राधारानी का शृंगार करते और कभी जब अरिष्ट आदि असुरों का वध करने को उद्यत होते तो कटि में मेखला को अच्छी प्रकार से कसते थे । उदार जो किसी को आत्मदान तक कर सकता है, वह उदार है । श्रीकृष्ण से अधिक उदार दूसरा कौन हो सकता है, जो भक्तों को अपना पूर्ण दान करने को सदा तत्पर रहते हैं। भगवान् चैतन्य महाप्रभु के रूप में तो जो भक्त नहीं है, उसे भी श्रीकृष्ण आत्मदान करके मुक्त कर देते हैं । यद्यपि श्रीकृष्ण सब से स्वतन्त्र हैं, फिर भी वे धर्मोपदेश के लिए गर्गाचार्य पर आश्रित हैं, युद्धविद्या के लिए सात्यकी पर निर्भर करते हैं और सद्परामर्श के लिए मित्रवर उद्धव उनके सहायक हैं।