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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

पृष्ठ 201, कुल 380 में से

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१७४ ] भक्तिरसामृतसिन्धु माधुर्य का एक उदाहरण श्रीमद्भागवत में इस प्रकार है, "यमुना के किनारे राधारानी की प्रतीक्षा करते हुए श्रीकृष्ण कदम्ब की माला बना रहे थे। तभी राधारानी का वहाँ आगमन हुआ और उस समय मुरारि ने उन पर अतिशय मधुर दृष्टि डाली।" मंगल्य जो सब अवस्थाओं में सबका विश्वासपात्र हो, उसे मंगल्य कहते हैं। इस सम्बन्ध में श्रील रूप गोस्वामी कहते हैं कि दानव भी श्रीकृष्ण की विश्वसनीयता पर निर्भर कर रहे थे, क्योंकि वे जानते थे कि न्याययुक्त कारण के बिना श्रीकृष्ण भी आक्रमण नहीं करेंगे। अतः वे निर्भय होकर द्वार खुले रखते थे । यद्यपि देवताओं को दानवों से भय था; परन्तु श्रीकृष्ण हमारे रक्षक हैं, यह सोचकर वे भय की अवस्था में भी क्रीड़ामत रहते थे। जिन्होंने कभी वैदिक विधि का आचरण नहीं किया, वे लोग भी यह जानकर निश्चिन्त हो रहे हैं कि श्रीकृष्ण केवल श्रद्धा-भक्ति को ही स्वीकार करते हैं। इसलिए वे कृष्णभावना के परायण होकर सम्पूर्ण उद्वेगों से मुक्त हो गए हैं। भाव यह है कि देवताओं से लेकर असभ्य मनुष्य तक सभी भगवान् श्रीकृष्ण की अहैतुकी कृपा पर निर्भर कर सकते हैं। स्थैर्य नाना विघ्न उपस्थित होने पर भी अपने निश्चय पर अचल रहना स्थैर्य है। बाणासुर-वध के प्रसंग में श्रीकृष्ण में स्थिरता प्रकट हुई है । बाण के हजार हाथ थे, परन्तु श्रीकृष्ण उन्हें एक-एक करके काटते गए। यह बाण शिव और दुर्गा का बड़ा भक्त था। अतः उसका वध होता देखकर शिव और दुर्गा श्रीकृष्ण पर बहुत क्रुद्ध हुए, परन्तु श्रीकृष्ण ने उनकी ओर ध्यान ही नहीं दिया। तेज जो सबके चित्त को प्रभावित कर सकता है, उसे तेजस्वी कहते हैं। श्रीकृष्ण के तेज के सम्बन्ध में श्रीमद्भागवत (१०.४३.१७) में शुकदेव गोस्वामी परीक्षित महाराजा से कहते हैं, "हे राजन् ! श्रीकृष्ण मल्लों के लिए वज्र के समान भयंकर हैं; साधारण मनुष्यों के लिए नरश्रेष्ठ; स्त्रियों के लिए मूर्तिमान् कामदेव; गोप-गोपियों के लिए परम बन्धु; दुष्ट राजाओं के लिए दण्ड देने वाले शासक; नन्द-यशोदा के लिए शिशु; भोजराज कंस

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