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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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पृष्ठ 209

१८२ ] भक्तिरसामृतसिन्धु नर्तन और पान चबाने से रक्तवर्ण हुई दन्तावली का ध्यान करतीं। गोपी कहती है, “हे सखि ! देखो, अधारि ने कैसा अभिनव सौन्दर्य धारण किया है। उनकी भ्रुवों में कामदेव के बाण सी चपलता और वक्रता है, नखाग्र कोमल पत्तों के समान मृदु हैं और दन्तपंक्ति रक्त है, मानो वे क्रुद्ध हों। यह रूप देखकर कौन स्त्री आकृष्ट होकर इस माधुरी पर सर्वस्व खो बैठने से भीतशंकित न होगी ?” श्रीकृष्ण की रूपमाधुरी का वर्णन स्वयं वृन्दावन की अधिष्ठात्री वृन्दादेवी ने भी किया है। उसने श्रीकृष्ण से कहा, “हे माधव ! तुम्हारी अभिनव स्मित ने गोपियों के मन को ऐसा मोह लिया है कि वे अपने भावों को अभिव्यंजित करने में भी समर्थ नहीं रही हैं। वे इतनी मुग्ध हो चुकी हैं कि किसी से कुछ कह तक नहीं सकतीं। लगता है मानों तुम्हारा दर्शन कर उन्होंने अपने प्राणों पर जलांजलि दे दी है, अर्थात् जीने की आशा ही छोड़ दी है।” वैदिक पद्धति के अनुसार मृत प्राणी पर जलांजलि छोड़ी जाती है। वृन्दा के वाक्य का अभिप्राय है कि श्रीकृष्ण की माधुरी से अति- शय मुग्ध हुई गोपियाँ अपने मन का भाव अभिव्यक्त करने में समर्थ न रहीं, इसलिये उन्होंने आत्महत्या का निश्चय कर लिया। जब श्रीकृष्ण मध्य कैशोर अर्थात् तेरह-चौदह वर्ष की आयु में पदार्पण करते हैं, तो दोनों जंघाओं, दोनों बाहुओं और वक्षस्थल में कोई अभूतपूर्व सौन्दर्य आ जाता है और मूर्ति तो बस मधुरिमामयी हो जाती है। इस वयधर्म में श्रीकृष्ण की जांघें गजतुण्ड को लजाती हैं, वक्षःस्थल मरकतमणि के कपाट से मित्रता करना चाहता है। भुजदण्ड अर्गला को तिरस्कृत करते हैं। श्रीकृष्ण की इस अद्भुत रूपमाधुरी का वर्णन भला कौन कर सकता है ? इन सब में भी श्रीकृष्ण मन्द-मन्द हँसी, चंचल नेत्र और त्रिभुवनविमोहन गति का सर्वाधिक वैशिष्ट्य हैं। ये इस वय के विशिष्ट लक्षण जो ठहरे। इस सम्बन्ध में एक श्लोक में उल्लेख है कि इस अवस्था के प्रवेश काल में श्रीकृष्ण में ऐसे अपूर्व रूप का विकास हुआ कि उनके चंचल नेत्र कामदेव के खिलौने बन गए तथा मृदु मुस्कान सद्योप्रस्फुटित कमलदल से भी अतिशय हो गई। यही नहीं, उनके उन्नत मनोहर संगीत का नाद कुलवधुओं के पातिव्रत को भंग करने वाला हो गया। इसी अवस्था में श्रीकृष्ण ने हास-परिहास, रासलीला और गोपियों के साथ यमुना तट पर स्थित निकुंज में विहार का आस्वादन किया। इस सम्बन्ध में एक श्लोक इस प्रकार है, “सम्पूर्ण वृन्दावनधाम