भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रेम के उद्दीपन [ १८३ श्रीकृष्ण और गोपियों के चरणचिह्नों से अंकित है । कहीं मोरपंख व्याप्त हो रहे हैं तो कहीं-कहीं कुंजों में सुखद शय्या सजी हुई है और कहीं गोविन्द और गोपियों के परस्पर नृत्य करने से बालुका इकट्ठी हो गई है।” बाकी ये कतिपय वे विलास हैं जो वृन्दावन में श्रीकृष्ण द्वारा प्रकटित लीला में हुए । इस अवस्था में श्रीकृष्ण के आकर्षण का वर्णन करते हुए एक गोपी कहती है, “हे सखि ! देख कैसे अकस्मात् कृष्णमेघ के भीतर माधुर्य प्रवाह- रूप प्रचण्ड सूर्य का उदय हो रहा है, जो हमारे पतिव्रतधर्म रूपी चन्द्रमा को मन्द किए दे रहा है । श्रीकृष्ण के लिए हमारा अनुराग इतना अतिशय प्रबल हो चला है कि हमारे विवेकरूपी कुमुद को सुखाए डाल रहा है। हम नहीं जानतीं कि हम पतिव्रता रहें या श्रीकृष्ण के लावण्य की शिकार हो जायें । हे सखि ! लगता है हमारे जीवन की कुछ भी आशा नहीं रही है ।” ग्यारहवें वर्ष के प्रारम्भ से पन्द्रहवें वर्ष के अन्त तक के शेष कैशोर के आने पर निश्चय ही शरीर का सौन्दर्य पहले से उत्कर्ष को प्राप्त होता है तथा भुजाओं, पैरों और जांघों में त्रिवली की अभिव्यक्ति होती है । उस समय श्रीकृष्ण का वक्षःस्थल मरकतमणि के विशाल पर्वत की शोभा को हरता है, भुजाएँ इन्द्रनीलमणि के स्तम्भों से तिरस्कृत करती हैं और कटि की त्रिवली के सामने यमुना की तरंगें तुच्छ प्रतीत होती हैं तथा जांघें कदलीदल से भी अतिशय सुगढ़ हो जाती हैं ।” एक गोपी बोली, “इस सम्पूर्ण अप्रतिम श्रीअंग माधुर्य धारी श्रीकृष्ण का विलक्षण सौन्दर्य है। इसलिए मैं उन्हीं के स्मरण में निमग्न रहती हूँ, क्योंकि वे सब असुरों को मारने वाले हैं ।” इस श्लोक का भाव इस प्रकार है । गोपियाँ श्रीकृष्ण के लिए अपने आकर्षण की तुलना असुरों के आक्रमण से कर रही हैं । श्रीकृष्ण के प्रति अपने आकर्षण के उपचार के लिए भी वे श्रीकृष्ण को ही याद करती हैं, इस आशा से कि वे सब असुरों के हन्ता हैं, इसलिए अवश्य सहायता करेंगे । वे द्विविधा में पड़ी हैं, क्योंकि एक ओर तो वे श्रीकृष्ण के माधुर्य से आकृष्ट है और दूसरी ओर चाहती हैं कि श्रीकृष्ण इस आकर्षण रूपी असुर को दूर करें । इसी शेष कैशोर को नव यौवन कहा गया है । कैशोर के अन्त में सब गोपियों ने कहा, “श्रीकृष्ण कामदेव के आकर्षण को हराने वाले हैं, अतः नव वधुओं के धैर्य के सेतु को तोड़ देते हैं। श्रीकृष्ण का श्रीअंग