भारतकोश
भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

पृष्ठ 211, कुल 380 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 211

१८४ ] भक्तिरसामृतसिन्धु तारुण्य इतना मधुर हो चला है कि मानो परमोच्च कलाविलास हो । सुन्दर मयूरों के समान नाचते हुए उनके नेत्रों ने कुशल नर्तकों की शोभा का भी अपहरण कर लिया है। अतः श्रीकृष्ण की माधुरी सर्वथा अनुपम है।" इसीलिए विद्वान् इस समय उनके शरीरवय को नवयौवन कहते हैं। इस अवस्था में गोपियों के साथ रास आदि लीलाओं का अतिशय प्राधान्य रहता है। प्रेमविलास की ये क्रीड़ाएँ हैं- दूतीस्तुति क्रिया, अनुनय (प्रणय), कलह, प्रेमी के पास जाना, निकट बैठना, विच्छेद और सन्धि । इन छः प्रेमविलासों के साम्राज्य का विस्तार करके राजा के रूप में श्रीकृष्ण उसका संचालन करते हैं। कहीं वे युवतियों से कलह करते हैं, कहीं तोते के नख चुभाते हैं, कभी गोपी-मिलन को जाते हैं तो कभी गोपों के माध्यम से गोपियों की शरण में जाने के लिए सन्धि करते हैं । गोपियों का एक वृन्द श्रीकृष्ण को सम्बोधित करते हुए कहने लगा, “हे कृष्ण ! तुम्हारा यह कैशोर गुरु बनकर आज सुन्दर युवतियों को सखियों के द्वारा सुनकर दूतियों के समय अनुनय करने की, रात्रि में पतियों को धोखा देकर तुमसे निकुंजों में मिलने की, गुरुजनों की बात न सुनने की, वंशीध्वनि को सुनने के लिए कान लगाए रखने की और प्रेम के सभी रहस्यों की शिक्षा दे रहा है।" यद्यपि श्रीकृष्ण ने पांच वर्ष की आयु में भी ऐसे नवयौवन की शक्ति का प्रकाश किया है, परन्तु योग्य वय से रहित होने के कारण विद्वान् उसका वर्णन नहीं करते। श्रीकृष्ण के सम्पूर्ण अंग सर्वथा निर्दोष एवं सुगढ़ थे, यही उनके सौन्दर्य का कारण है। श्रीकृष्ण में प्राप्त अंगों के इस यथायोग्य सन्निवेश का वर्णन इन शब्दों में है, "हे कंसारि श्रीकृष्ण ! बड़ी बड़ी आँखों वाला तुम्हारा मुख, मरकतमणि के सदृश उन्नत वक्षस्थल, स्तम्भ जैसे भुजदण्ड तथा क्षीण कटि आदि किस मृगनयनी के चित्त का हरण नहीं करेंगे?" श्रीकृष्ण के श्रीअंग पर विराजित विभूषणों से श्रीकृष्ण की शोभा नहीं बढ़ती, बल्कि श्रीकृष्ण की माधुरी से विभूषण ही विभूषित हो जाते हैं । जो कोमल स्पर्श को भी सहन कर सके, उसे मृदु कहते हैं । श्रीकृष्ण के सभी अंग इतने अतिशय सुकुमार थे कि नवजात पत्ते के स्पर्श से भी उनका वर्ण बदल जाता । इस कैशोर में श्रीकृष्ण की सम्पूर्ण चेष्टाएँ, वृन्दावन में रासोत्सव और दुष्टदलन के लिए ही होती थीं। वृन्दावन में श्रीकृष्ण का गोपियों के साथ क्रीड़ा करते समय कंस उनके वध के हेतु