भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
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प्रकार की है। उनके आविर्भाव से छठे वर्ष के प्रारम्भ का काल कौमार कहलाता है, छठे वर्ष के आरम्भ से दसवें वर्ष तक पौगण्ड अवस्था रहती है तथा दसवें से सोलहवें वर्ष तक कैशोर रहता है। सोलहवें वर्ष के बाद श्रीकृष्ण यौवन में प्रवेश करते हैं, जिसके बाद श्रीकृष्ण की वय में परिवर्तन नहीं होता। श्रीकृष्ण की दिव्य लीलाएँ प्राधान्यतः कौमार, पौगण्ड और कैशोर अवस्था में सम्पादित होती हैं। नन्द-यशोदा से उनकी वात्सल्यरसमयी लीला कौमार में हुई; गोपबालकों से सख्यरस का प्रकाश पौगण्ड अवस्था में हुआ और कैशोर में गोपियों से उनका प्रेमविलास है। श्रीकृष्ण की वृन्दावनलीला उनके पन्द्रहवें वर्ष तक पूर्ण हो जाती है। आगे की लीला वे मथुरा और द्वारका में करते हैं। श्रील रूप गोस्वामी भक्तिरसामृतसिन्धु में अखिल रसों के आश्रय के रूप में श्रीकृष्ण का विशद वर्णन करते हैं, जिसका सार इस प्रकार है। श्रीकृष्ण के कैशोर को तीन भागों में विभाजित किया जा सकता है—आद्य, मध्य तथा शेष कैशोर। श्रीकृष्ण के कैशोर का आरम्भ होने पर, अर्थात् ग्यारहवें वर्ष के आदि में उनका श्रीअंग कुछ इतना उज्ज्वल हो जाता है कि प्रेम के उद्दीपक का काम करता है इसी प्रकार नयनों में अरुणिमा छा जाती है और शरीर पर रोमावली प्रकट होने लगती है। श्रीकृष्ण के इस आदि कैशोर का वर्णन करते हुए वृन्दावन में कुन्दलता ने अपनी सखी से कहा, "हे सखि ! मैंने अभी-अभी श्रीकृष्ण के विग्रह में एक अपूर्व सुषमा स्फुरित होती देखी है। उनके शरीर की श्यामलता इन्द्र- नीलमणि की कान्ति का अपहरण कर रही है, नेत्रों में अरुणच्छवि है और शरीर पर रोमराजी उदित हो रही है। इन लक्षणों के उदय ने उन्हें असमोध्वं माधुरी प्रदान की है।" इस सन्दर्भ में श्रीमद्भागवत (१०.२१.५) में शुकदेव गोस्वामी महा- राज परीक्षित से कहते हैं, “गोपियों का मन श्रीकृष्ण के चिन्तन में तन्मय हो गया था। वे ध्यान में देखतीं कि श्रीकृष्ण ने नटवर वेष धारण किया है और भूमि पर अपने चरणचिह्नों को अंकित करते हुए वन में प्रवेश कर रहे हैं। श्रीकृष्ण सिर पर मोरपिच्छ और कर्णों में कर्णिकार धारण किए हुए हैं। पीताम्बर और वैजयन्ती माला से विभूषित हैं। इस प्रकार वंशी- वादन करते हुए श्रीकृष्ण की कीर्ति का गोपबालक गान कर रहे हैं।" गोपियाँ नित्य इसी ध्यान का अभ्यास करती थीं। कभी-कभी गोपीजन श्रीकृष्ण के नखाग्रों की कोमलता, भ्रूवों के