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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

पृष्ठ 216, कुल 380 में से

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अध्याय २७ प्रेम के लक्षण (अनुभाव) भक्त के शरीर में प्रकट होकर कृष्णप्रेम को अभिव्यक्त करने वाले लक्षण अनुभाव कहलाते हैं। अनुभाव ये हैं—नाचना, लोटना, गाना, चिल्लाना, देह मोड़ना, हुंकार करना, जंभाई लेना, दीर्घ श्वास लेना, लोक की चिन्ता न करना, लार टपकना, अट्टहास करना, चक्कर आना, हिचकी आना। जब प्रेम में अद्भुत अतिशयता आ जाती है तो इन शारीरिक लक्षणों के प्रकट होने से दिव्य आनन्द की अनुभूति होती है। इन अनुभावों के दो भाग हैं—शीत और क्षेपण। जम्भाई लेना आदि शीत है तथा नाचना आदि क्षेपण हैं। नाचना गोपियों के साथ रासलीला करते हुए भगवान् श्रीकृष्ण के मुखचन्द्र को निहार कर शिवजी डिण्डिम डमरू बजाते हुए नाचने लगे और गणेशजी भी उनके साथ सम्मिलित हो गए। विलुठन श्रीमद्भागवत (३.१.३२) में विदुर की उद्धव से जिज्ञासा है, "हे सखे! अक्रूरजी सुखपूर्वक तो हैं न? वे विद्वान् और निर्मलचित्त होने के साथ ही भगवान् के भक्त भी हैं। मैंने स्वयं देखा है कि कृष्ण के प्रेम में अधीर होकर वे श्रीकृष्ण के चरणचिह्नों से अंकित भूमि पर लोट गए थे।" इसी प्रकार किसी गोपी ने श्रीकृष्ण से कहा कि उनकी अभिनव अनुरागवती राधारानी उनकी वनमाला की सुगन्ध से मत्त होकर विरहवश कठोर भूमि पर लोट-लोट कर अपने मृदु शरीर का मर्दन कर रही हैं। उच्च स्वर से गाना एक गोपी ने श्रीकृष्ण को बताया कि राधाजी उनका गुणगान कर रही

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