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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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पृष्ठ 213

१८६ ] भक्तिरसामृतसिन्धु अपना श्रृंगार करते हैं। श्रीकृष्ण का यह श्रृंगार वृन्दावन में ही नहीं था, वरन् कुरुक्षेत्र की युद्धभूमि में भी दृष्टिगोचर होता था। इन रंग-बिरंगे वस्त्रों और पुष्पों से उन्हें विभूषित देखकर ऋषिगण स्तुति करने लगे, "भगवान् श्रीकृष्ण कुरुक्षेत्र की युद्धभूमि के लिए नहीं, अपितु अपनी उपस्थिति से सारे भक्तों पर कृपा करने के लिए जा रहे हैं।" श्रीकृष्ण की बांसुरी श्रीकृष्ण की बाँसुरी इतनी अद्भुत है कि उसकी ध्वनि ने परमहंसों के ध्यान को भंग कर दिया। इस प्रकार अपनी कीर्ति का त्रिभुवन में विस्तार करके श्रीकृष्ण कामदेव को ललकार रहे थे। श्रीकृष्ण की बाँसुरी के वेणु, मुरली और वंशी—ये तीन भेद हैं। वेणु बारह अंगुल लम्बी और छः छिद्रों से युक्त होती है। दो हाथ लम्बी, मुखछिद्र सहित चार अतिरिक्त स्वरछिद्रों वाली मुरली है। इससे अतिशय मधुर ध्वनि निःसृत होती है। नौ छिद्रों से युक्त और सत्रह अंगुल लम्बी वंशी है। श्रीकृष्ण यथासमय इन सब बाँसुरियों का वादन करते हैं। श्रीकृष्ण की एक महानन्दा अथवा सम्मोहिनी नामक बड़ी वंशी भी है। उससे भी बड़ी हो तो वह आकर्षिणी कहलाती है। आनन्दिनी आकर्षिणी से भी विशाल है। यह आनन्दिनी वंशी गोपबालकों की अतिशय प्रिया है। इसका एक नाम वंसुली भी है। ये वंशियाँ मणिमयी, सुवर्णमयी और बांस की बनी होती हैं। मणिमयी वंशी संमोहिनी कहलाती है और सुवर्णमयी आकर्षिणी कही जाती हैं। श्रीकृष्ण का श्रृंग श्रीकृष्ण घोष करने के लिए श्रृंग का प्रयोग करते थे। सोने से मण्डित और मध्य में रत्नजड़ित इस वाद्य के बीच में छिद्र रहता है। इस सन्दर्भ में तारावली नामक गोपी के सम्बन्ध में श्लेष युक्त वाक्य है, जिसमें कहा गया है कि श्रीकृष्ण की वंशीरूप परम विषधर सर्प से डसी तारावली ने उपचार के लिए श्रीकृष्ण के करकमलों में स्थित श्रृंग का नादरूप दुग्ध पी लिया। परन्तु उससे विष का प्रभाव कम होने के बजाय हजार गुणा बढ़ गया। इस प्रकार श्रृंग की ध्वनि से उसकी बड़ी दुर्दशा हुई। श्रीकृष्ण के पद-नूपुरों का आकर्षण किसी गोपी ने अपनी सखी से कभी कहा, "हे सखि ! श्रीकृष्ण की