भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
DevanagariHindipublished380 पृष्ठ
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१६२ ] भक्तिरसामृतसिन्धु प्रमाण में पौर्णमासी राधा की एक सखी से कहती है, "हे पुत्रि ! प्रिय सखी राधारानी के हिक्कार के लिए औषधि रचने की आवश्यकता नहीं है और उसके अनिष्ट की आशंका भी व्यर्थ है। हे मृगनयनी ! तुम चिल्लाती क्यों हो ? इसका कारण अपच नहीं है; यह तो कृष्णप्रेम का ही विकार है। इसीलिए कृष्णनाम के साथ हिचकी पर हिचकी हो रही है।" पौर्णमासी का यह वाक्य इस बात का प्रमाण है कि कृष्णप्रेम कभी-कभी हिक्कार के रूप में भी अभिव्यक्त होता है। कदाचित् सम्पूर्ण शरीर का कंपित होना या फूल जाना तथा किसी अंग से रक्त निकलना आदि अनुभाव भी होते हैं। परन्तु ये अतीव दुर्लभ हैं; इसलिए श्रील रूप गोस्वामी ने इनका अधिक वर्णन नहीं किया है।