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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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पृष्ठ 220

अध्याय २८ सात्त्विक भाव श्रीकृष्ण सम्बन्धी भावों से साक्षात् रूप में अथवा थोड़े व्यवधान से अभिभूत हुए चित्त को मनीषीजन 'सत्त्व' कहते हैं। ऐसे सात्त्विक भाव से उत्पन्न होने वाले लक्षण तीन प्रकार के होते हैं—स्निग्ध, दिग्घ तथा रुक्ष। स्निग्ध सात्त्विक भाव के मुख्य और गौण दो भेद हैं। राधारानी कुन्द पुष्पों की माला गूंथ रही थीं। उसी समय श्रीकृष्ण की वंशी बज उठी और उसे सुनते ही उन्होंने तुरन्त अपना कार्य बन्द कर दिया। यह मुख्य स्निग्ध सात्त्विक भाव का उदाहरण है। गौण स्निग्ध सात्त्विक भाव का वर्णन इस प्रकार है, "अपने नेत्ररूप चातक के लिए मेघ के समान श्रीकृष्ण को मथुरा जाते देखकर यशोदा क्रोधवश लाल-लाल मुख से मथुरानरेश पर चिल्लाने लगी।" दिग्ध सात्त्विक भाव के तीन भेद हैं, जिन का एक उदाहरण इस प्रकार है—"रात्रि में स्वप्न में पूतना को अपने प्रांगण में पड़ा देखकर यशोदा को कम्प हो आया और वे तुरन्त अपने लाल कृष्ण को खोजने लगीं।" जब भाव के लक्षण अभक्त के शरीर पर प्रकट होते हैं तो उन्हें रुक्ष कहा जाता है। अभक्त वस्तुतः विषयी होते हैं, परन्तु किसी शुद्धभक्त के संग से उनमें भी कभी भाव के लक्षण अभिव्यक्त हो सकते हैं। भक्ति के विद्वान् इन्हें रुक्ष सात्त्विक भाव कहते हैं। सात्त्विक भाव के आठ लक्षण हैं : स्तम्भ, स्वेद, रोमांच, स्वरभेद, कम्पन, विवर्णता, अश्रुधारा, तथा प्रलय। श्रील रूप गोस्वामी ने इन भावों का वैज्ञानिक विवरण दिया है। जब प्राण पृथ्वी में स्थिर हो जाता है तो स्तम्भ को उत्पन्न करता है, जल के संसर्ग में आने पर अश्रु, अग्नि के संग में स्वेद और वैवर्ण्य को तथा