भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६४ ] भक्तिरसामृतसिन्धु आकाश में आश्रित प्राण मूर्च्छा उत्पन्न करता है। जब प्राण स्वयं अपने में स्थिर होता है तो तीव्रता के भेद से क्रमशः कम्प, स्वरभेद और रोमांच को जन्म देता है। ये सात्त्विक भाव कभी बाह्य रूप से प्रकट होते हैं तो कभी अन्तर में ही रहते हैं। शुद्धभक्त इन सब भावों का हृदय में निरन्तर अनुभव करता है; परन्तु बहिर्मुख मनुष्यों के सामने उन्हें प्रायः बाहर प्रकट नहीं होने देता । स्तम्भ स्तम्भ की उत्पत्ति हर्ष, भय, आश्चर्य, शोक तथा क्रोध से होती है। वाणी का अभाव, निश्चलता, शून्यता तथा परम विरह का भाव इसके लक्षण हैं। श्रीकृष्ण की लीलाओं का वर्णन करते हुए उद्धवजी विदुर से कहने लगे, “एक दिन श्रीकृष्ण ने मालिन का श्रृंगार किया और उद्यान में प्रवेश कर गोपियों को हास-परिहास से आनन्दित किया। गोपियाँ स्तब्ध हो उठीं। फिर श्रीकृष्ण को जाते हुए गोपियाँ इस भाव से देख रही थीं मानो उनके चित्त और नेत्र श्रीकृष्ण का अनुगमन कर रहे हों।” इन लक्षणों से यद्यपि गोपियाँ तृप्त नहीं हुई थीं, वे प्रेम से स्तब्ध हो गई । यह हर्ष-जनित स्तम्भता का दृष्टान्त है। भय के कारण स्तम्भ का उदाहरण इस प्रकार है। जब श्रीकृष्ण कंस के यज्ञमण्डप में पर्वत के समान मल्लों से घिरे हुए थे तो माता देवकी स्तम्भित हो गई, उनके दोनों नेत्र आकुल हो उठे।” ब्रह्मा को आश्चर्य से स्तम्भ हुआ था। श्रीमद्भागवत (१०.१३.५६) के अनुसार अपने द्वारा चुराए गो-गोपबालकों को पुनः श्रीकृष्ण के पास देखकर जब ब्रह्मा ने जाना कि ये गोपकुमार और कोई नहीं, साक्षात् भगवान् है तो आश्चर्यवश उनकी सारी इन्द्रियाँ स्तम्भित हो गई। वे स्वर्णमयी चतुर्भुज मूर्ति के समान खड़े के खड़े रह गए। श्रीकृष्ण को अपने वाम कर से गोवर्धन पर्वत को धारण किए देखकर व्रजवासी भी स्तब्ध हुए थे। जिस समय श्रीकृष्ण ने बकासुर के उदर में प्रवेश किया, उस समय सारे देवता शोक से स्तब्ध रह गए थे। क्रोध के कारण कुछ ऐसा ही अर्जुन के साथ भी हुआ, अब उसने देखा कि अश्वत्थामा श्रीकृष्ण पर ब्रह्मास्त्र चलाने जा रहा है।