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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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सात्त्विक भाव [ १६५ स्वेद हर्ष से उत्पन्न स्वेद का उदाहरण श्रीमद्भागवत में है। एक गोपी अपनी सखी राधारानी से कहती है, "हे राधे ! धूप की निन्दा करके अपनी चतुराई क्यों दिखा रही हो। श्रीकृष्ण को देखकर काम-पीड़ित होकर पसीने-पसीने हो रही हो, यह तो मैं जान ही गई हूँ।" श्रीकृष्ण के सेवक रक्तक में भय से स्वेदस्राव हुआ था। एक दिन श्रीकृष्ण ने राधारानी के पति अभिमन्यु का वेष धारण किया। अभिमन्यु को श्रीकृष्ण से राधा का प्रणय रुचिकर न था। इसलिए रक्तक ने श्रीकृष्ण को उस रूप में देखा तो वह भी प्रेम से उन्हें अभिमन्यु समझ बैठा; अतः उन्हें फटकारने लगा। फिर जैसे ही उनसे पहचाना कि यह तो अभिमन्यु के वेष में श्रीकृष्ण ही हैं, तो पसीने-पसीने हो गया। यह स्वेद भयजन्य था। क्रोध के कारण स्वेद की उत्पत्ति विष्णुवाहन गरुड में हुई है। जिस समय इन्द्र वृन्दावन पर मूसलाधार वर्षा कर रहा था, गरुड़जी इस दृश्य को मेघों के ऊपर से देख रहे थे और क्रोध के कारण उनके शरीर से स्वेद बहने लगा। रोमांच श्रीकृष्ण के मुख में त्रिलोकी को देखकर माता यशोदा को रोमांच हो आया। उन्होंने श्रीकृष्ण से मुख खोलने को कहा था यह देखने के लिए कि उन्होंने मृद-भक्षण किया है या नहीं। परन्तु जब श्रीकृष्ण ने मुख खोला तो उन्हें सम्पूर्ण पृथ्वी के साथ अन्य लोक भी कृष्ण के मुख में दृष्टिगोचर हुए। इससे वे रोमांचित हो गईं। हर्ष से होने वाले रोमांच का वर्णन गोपियों के रासविलास के सम्बन्ध में श्रीमद्भागवत (१०.३०.१०) में है। इस रास में श्रीकृष्ण अकस्मात् अन्तर्हित हो गये और गोपियों सहित राधारानी उन्हें ढूँढने लगीं। वे पृथ्वी से बोलीं, "हे धरा ! तुमने कितना तप किया होगा जो तुम्हें श्रीकृष्ण के चरणकमलों का निरन्तर स्पर्श प्राप्त रहता है। अवश्य ही आनन्द से पुलकित होकर इस वनस्पतिरूप रोमांच से शोभित हो रही हो। तुममें प्रेम के ये लक्षण प्रथम कब विकसित हुए ? तुम्हारा यह आनन्द महोत्सव वामनावतार के स्पर्श से प्रारम्भ हुआ है अथवा भगवान् वराह ने जब तुम्हारा उद्धार किया था, तब से ?" श्रीकृष्ण कभी-कभी गोपबालकों के साथ बनावटी युद्ध का आयोजन किया करते थे। ऐसे समय जब वे अपना श्रृंग बजाते तो विरोधी पक्ष के