भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६६ ] भक्तिरसामृतसिन्धु श्रीदामा को उत्साहवश रोमांच हो जाता । इसी प्रकार श्रीकृष्ण के विश्वरूप को देखकर अर्जुन भय से रोमांच को प्राप्त हुआ । स्वरभेद अक्रूर के रथ पर बैठ कर मथुरा जाते हुए श्रीकृष्ण के पथ को रोकने के लिए यशोदा और सारी गोपियाँ सामने आकर खड़ी हो गई । राधारानी की दशा तो विशेष रूप से इतनी दयनीय हो गई थी कि काँपती हुई वाणी में उन्होंने यशोदा से अक्रूर को रोकने का निवेदन किया । ब्रह्मा को आश्चर्यजनित स्वरभेद का अनुभव हुआ । श्रीमद्भागवत (१०.१३.६४) में उल्लेख है कि श्रीकृष्ण को दण्डवत् प्रणाम करके ब्रह्मा ने गद्गद् वाणी में उनकी स्तुति की । श्रीमद्भागवत (१.२६.३०) में ही गद्गद् वाणी का एक अन्य उदाहरण है । गोपीजन रात्रि में सब कुछ त्याग कर श्रीकृष्ण के साथ रास करने आयी थीं, परन्तु श्रीकृष्ण ने उन्हें वापस अपने पतियों और घर को लौट जाने को कहा । इस पर वे क्रोध के कारण गद्गद् वाणी से श्रीकृष्ण से प्रतिभाषण करने लगीं । हर्ष-जनित स्वरभेद का प्रकाश अक्रूर ने श्रीमद्भागवत (१०.३६.५६- ५७) में किया है, जब उन्होंने सम्पूर्ण वैकुण्ठों को यमुना जल पर आश्रित देखा । तब उन्हें ज्ञान हुआ कि श्रीकृष्ण स्वयं भगवान् हैं और वे श्रीकृष्ण के चरणकमलों में सिर झुकाकर गद्गद वाणी से करबद्ध स्तुति करने लगे । भय के कारण भी स्वरभेद होने के उदाहरण है । श्रीकृष्ण के एक सखा ने उनकी प्रशंसा में कहा, "हे सखे ! तुम्हारी वंशी तुम्हारे ही एक सेवक पात्री को दी थी और जब मैंने वह वापस माँगी तो उसकी वाणी गद्गद हो गई और मुख का रंग पीला पड़ गया ।" कम्प श्रीकृष्ण को शंखासुर को पकड़ता देखकर राधारानी भयवश काँपने लगीं । इसी प्रकार का कम्पन सहदेव में उस समय देखा गया जब शिशुपाल भगवान् श्रीकृष्ण को भीषण अपशब्द कह रहा था । पीड़ावश शरीर का कम्प राधाजी में भी प्रकट हुआ । वे काँपते हुए गोपी से बोलीं, "इस निष्ठुर से हँसी मत कर । इसने सदा हमें दुःख ही दुःख पहुँचाया है, इसलिए यहाँ आने से इसे मना कर दे ।"