भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६८ ] भक्तिरसामृतसिन्धु बह चली। इतनी विषाद-मग्न हो गयी कि उसकी वाणी भी गद्गद् हो चली। प्रलय एक साथ दुःख और सुख की अतिशयता के कारण जब यह बोध नहीं रहता कि क्या करना है, क्या नहीं करना—उस स्थिति को प्रलय कहते हैं। प्रलय की अवस्था में भक्त पृथ्वी पर गिर पड़ता है और प्रेम के सम्पूर्ण लक्षण (अनुभाव) प्रकट हो जाते हैं। गोपियाँ श्रीकृष्ण को खोज रही थीं। तभी अचानक वनलता में से उन्हें स्तब्ध और इन्द्रियज्ञान शून्य करते हुए वे सामने प्रकट हो गए। इस अवस्था में गोपियाँ सौन्दर्यातिशय को प्राप्त हो गयीं। यह सुख के कारण प्रलय का एक उदाहरण है। दुःखजनित प्रलय के भी अनेक उदाहरण हैं। श्रीमद्भागवत (१०.३६.१५) में शुकदेव गोस्वामी महाराज परीक्षित को कहते हैं, “हे राजन् ! श्रीकृष्ण के विरह में गोपियाँ श्रीकृष्ण के चिन्तन में ऐसी तन्मय हो गयीं कि उनकी इन्द्रियों के सब व्यापार रुक गए और वे शरीर की सुध-बुध से बिल्कुल रहित हो गयीं मानो सम्पूर्ण भवबन्धन से मुक्त हो गयी हों। सात्त्विक के न्यूनाधिक तारतम्य शरीर के विविध सात्त्विक भावों में स्तम्भन का विशेष स्थान है। स्तम्भन के न्यूनाधिक्य के अनुसार प्राण और शरीर के विक्षोम में भी तारतम्य होता है। इसीलिए अन्य सात्त्विक भावों में भी न्यूनाधिक्य है। ये सात्त्विक भाव शनैः-शनैः विकसित होते हैं और क्रमशः धूमायित, ज्वलित, दीप्त तथा उद्दीप्त कहलाते हैं। ये भाव बहुत काल तक रहते हैं और शरोर के अनेक अंगों में व्याप्त रहते हैं। अश्रुपात और स्वरभेद के विपरीत स्तम्भन सम्पूर्ण शरीर में व्याप्त होता है। अश्रुपात और स्वरभेद तो केवल एकांगी भाव हैं। अश्रुओं में दो विशेषताएँ हैं—आँखों को अवदात और सुजा देना तथा आंखों के तारों को विलक्षण कर देना। स्वरभेद से गला रुक जाना, कुण्ठा और अत्यन्त व्याकुलता होती है। इन सात्त्विक भावों के लक्षण एकदेशीय हैं, इसलिए उनके साथ अन्य अंग-विकार भी होते हैं। उदाहर- णार्थ, स्वरभेद के कारण गला रुक जाने पर घुर-घुर ध्वनि होती है। ऐसी ध्वनियाँ वाणी को कुण्ठित कर देती हैं और परम व्याकुलता के साथ