भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसात्त्विक भाव [ १६६ नाना प्रकार से अभिव्यक्त होती हैं। ये सब लक्षण रुक्ष सात्त्विक भाव धूमा- यित अवस्था के हैं। कभी-कभी श्रीकृष्ण के महोत्सवों अथवा भक्त-समाज में नृत्य-उन्माद होता है। ये भाव 'ज्वलित' कहलाते हैं। श्रीकृष्ण में दृढ़ रति रूपी मूलभूत आधार के अभाव में उपरोक्त कोई भी लक्षण प्रकट नहीं हो सकता। ये सात्त्विक जब तनिक से ही व्यक्त होते हैं और छिपाए जा सकते हैं, तब धूमायित अवस्था के सात्त्विक भाव माने जाते हैं। नन्द महाराज के प्रासाद में वैदिक कर्म कहते हुए पुरोहित गर्ग मुनि में ये लक्षण हुए थे। जब उन्होंने सुना कि बालक कृष्ण ने अघासुर को मार डाला तो उनके नेत्र अश्रुओं से आर्द्र प्रतीत हुए, कण्ठ में कम्प होने लगा तथा सम्पूर्ण शरीर पसीने से तर हो गया। इस अवस्था में गर्ग मुनि का सुन्दर मुखमण्डल बड़ा शोभित हुआ। जब दो या तीन या अधिक सात्त्विक भाव स्पष्ट रूप में प्रकट हो कर कठिनाई से छिपने के योग्य हो जाते हैं तब उन्हें ज्वलित कहा जाता है। उदाहरण के लिए, श्रीकृष्ण के सखा ने उनसे कहा, "हे सखे ! वन में बज रही तुम्हारी वंशी के कानों में प्रविष्ट होते ही हाथ सर्वथा निश्चेष्ट हो गये हैं और नेत्र अश्रुधारा से अभिभूत हो रहे हैं। अब वे तुम्हारे मोर- पंख को भी नहीं पहचान पाते। जांघें स्तम्भित हो गई हैं, जिससे पग भर चलना भी सम्भव नहीं रहा है। इसलिए हे मित्र ! तुम्हारी वंशीध्वनि निश्चय ही अद्भुत है।" इसी प्रकार का भाव एक गोपी दूसरी पर प्रकट करती है, "हे सखि ! वंशी की ध्वनि को सुनकर मैंने उसके प्रभाव को रोकने की पूरी चेष्टा की। परन्तु शरीर के कम्प को नहीं रोक सकी, जिससे परिजनों ने मेरे मन के कृष्णप्रेम को भाँप ही लिया।" चार-पाँच सात्त्विक-भाव एक साथ प्रौढ़ रूप में उदित हो कर छिपाने के बिलकुल अयोग्य हो जाते हैं तो विद्वान् उन्हें 'दीप्त' कहते हैं। श्रीकृष्ण को सामने खड़ा देखकर नारदजी कुछ ऐसे कम्प से आक्रान्त हुए कि देर तक.वीणा भी नहीं बजा सके। गद्गद् वाणी के कारण उनमें श्रीकृष्ण का स्तवन करने का सामर्थ्य न रही और आँखें अश्रुओं से परिपूर्ण हो गयीं। इस प्रकार वे सर्वथा अवश हो गए। जब कुछ ऐसे ही भाव राधारानी में प्रस्फुटित हुए तो सखी उन्हें उपालम्भ देने लगीं, "हे सखि ! नेत्र में अश्रुधारा के लिए पुष्पों की सुगन्ध को क्यों व्यर्थ दोष देती हो ? शरीर पर रोमांच के लिए क्यों वायु पर