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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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पृष्ठ 227

२०० ] भक्तिरसामृतसिन्धु कोप करती हो। जांघों के स्तम्भन के लिए वन-विहार से द्वेष क्यों करती हो। तुम्हारा स्वरभेद बता रहा है कि इसका कारण तो कुछ और ही है—कृष्ण के लिए तुम्हारा प्रेम ही इसमें हेतु है।" श्रील रूप गोस्वामी कहते हैं कि पाँच-छः अथवा सारे ही सात्त्विक भाव एक साथ प्रकट होकर परम उत्कर्ष को प्राप्त होने पर 'उद्दीप्त' कहलाते हैं। श्रीकृष्ण के एक सखा ने उनसे कहा, "हे पीताम्बर ! तुम्हारे विरह में सारे वृन्दावनवासी स्वेदयुक्त हो रहे है, नाना ध्वनियों से विलाप करते हैं; उनके शरीरों में कम्प, रोमांच और स्तम्भन हो चला है, नेत्र अश्रुधारा से अभिभूत हैं। अत्यन्त व्याकुल हैं।" प्रेम का एक चरम लक्षण 'महाभाव' है। इस महाभाव की अनुभूति केवले राधारानी के लिए ही सम्भव है। पाँच सौ वर्ष पूर्व श्रीचैतन्य महाप्रभु राधाप्रेम का आस्वादन करने प्रकट हुए। उनमें भी महाभाव का पूर्ण प्रकाश था। श्रील रूप गोस्वामी का कथन है कि जब प्रेम के लक्षण सुदीप्त हो जाते हैं, तो वह अवस्था महाभाव कहलाती है। श्रील रूप गोस्वामी आगे चार प्रकार के सात्त्विकाभास का विवेचन करते हैं। कभी-कभी निर्विशेषवादी भी, जो यथार्थ में भक्ति से रहित हैं, प्रेम के इन भावों को प्रकट कर सकते हैं; परन्तु ये यथार्थ में भाव नहीं हैं, वरन् आभासमात्र हैं। उदाहरण के लिए, निर्विशेषवादियों की पावन नगरी वाराणसी में कदाचित् ऐसा संन्यासी दृष्टिगोचर हो सकता है जो भगवान् की महिमा का श्रवण कर अश्रुविमोचन कर रहा हो। निर्विशेषवादी कभी- कभी हरे कृष्ण महामन्त्र का कीर्तन और नृत्य भी करते हैं, पर उनका लक्ष्य भगवान् की सेवा करना नहीं है। वे यह सब भगवान् एक होकर उनके अस्तित्व में लीन होने के लिए ही करते हैं। अतः श्रील रूप गोस्वामी का कथन है कि निर्विशेषवादी के शरीर में कीर्तन से हुए विकार भाव के यथार्थ लक्षण नहीं हैं; वरन् आभासमात्र हैं, जैसे चमकदार शीशे में से सूर्य किसी अंधेरे कक्ष में प्रतिभासित होता है। परन्तु हरेकृष्ण जप इतना अतिशय प्रभावशाली और दिव्य है कि कालान्तर में निर्विशेषवादियों के हृदय को भी द्रवित कर देगा। रूप गोस्वामी निष्कर्ष करते हैं कि निर्विशेष- वादियों में प्रकट विकार सात्त्विक भावों के आभासमात्र हैं, यथार्थ वस्तु नहीं हैं। कदाचित् देखने में आता है कि भक्ति और भगवत्-कीर्ति के लेश- मात्र ज्ञान से रहित तार्किक भी जब भगवान् का गुणगान सुनने बैठता है तो