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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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पृष्ठ 228

हृदय से द्रवीभूत होकर अश्रु बहाता पाया जाता है। इस सम्बन्ध में एक भक्त भगवान् से कहता है, "हे मुकुन्द ! आप के लीलामृत की महिमा के सम्बन्ध में मैं क्या कह सकता हूँ, जिसका श्रवण कर अभक्त भी प्रभावित हो जाते हैं, उनके नेत्रों से अश्रु निर्भर प्रवाहित होने लगता है और शरीर रोमांचित हो जाता है।" ऐसे अभक्त वास्तव में द्रवित नहीं होते; वे भीतर से कठोर हैं। फिर भी भगवान् के गुणगान की कैसी अपार महिमा है कि अभक्त तक रो पड़ते हैं।" जो कृष्णरस से प्रायः सर्वथा विहीन है और जिसने किसी विधि- नियम का पालन नहीं किया है, ऐसा अभक्त भी कभी-कभी अभ्यास के द्वारा भक्तमण्डली में अश्रु आदि सात्त्विक भावों का दम्भ करता है। परन्तु ये अश्रु आदि यथार्थ प्रेम के लक्षण बिलकुल नहीं हैं। यह सब तो केवल अभ्यास के द्वारा किया जाता है। यद्यपि सात्त्विकाभासों के वर्णन से कोई लाभ नहीं है, श्रील रूप गोस्वामी ने कुछ ऐसे उदाहरण दिए हैं, जहाँ यथार्थ भक्ति तो नहीं है, पर ये प्रकट होते हैं।