भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय २६ कृष्णप्रेम के व्यभिचारिभाव प्रेमातिशय को अभिव्यक्ति प्रदान करने वाले कतिपय शारीरिक लक्षण हैं। ये संख्या में ३३ हैं : निर्वेद, विषाद, दैन्य, ग्लानि, श्रम, मद, गर्व, शंका, त्रास, आवेग, उन्माद, विस्मृति, व्याधि, मोह, मृत्यु, आलस्य, जड़ता, लज्जा (व्रीड़ा), गोपन, स्मृति, वितर्क, चिन्ता, मति, धृति, हर्ष, उत्सुकता, उग्रता, अमर्ष, निद्रा, स्वप्न, बोध, चपलता और असूया । निर्वेद जब किसी को बलात् कोई निषिद्ध विधि से कार्य करना पड़ता है अथवा इच्छा होने पर भी वाँछनीय विधि से कार्य नहीं कर पाता तो उसे ग्लानि होती है और वह अपने को अपमानित अनुभव करता है। ऐसे में निर्वेद का भाव उसे अभिभूत कर लेता है । निर्वेद में चिन्ता, अश्रु, विवर्णता, दैन्य तथा दीर्घ उच्छ्वास आदि लक्षण प्रकट होते हैं। जब नन्द महाराज को लगा कि कालिया नाग को दण्ड देते-देते श्रीकृष्ण यमुना के विषाक्त जल में डूब गए हैं तो वे यशोदा देवी से कहने लगे, "हे देवी ! श्रीकृष्ण गहरे जल में चले गए हैं और इसलिए अब इन पापमय शरीरों को धारण करने से क्या लाभ ! अपने पापों का प्रायश्चित करने के लिए आओ हम विषममय कालीदह में भस्म हो जाएँ ।" यह महती विपत्ति से भक्त को होने वाले निर्वेद का उदाहरण है। श्रीकृष्ण के वृन्दावन से चले जाने पर उनके अंतरंग सखा सुबल ने भी वहाँ न रहने का निश्चय किया । जाते-जाते सुबल सोच रहा था कि कृष्ण के बिना वृन्दावन में कुछ भी आनन्द शेष नहीं रहा है। जैसे नीरस पुष्प को भ्रमर त्याग जाते हैं, वैसे ही वृन्दावन को दिव्य रसानन्द से हीन जानकर सुबल उसे त्याग कर चला गया । 'दानकेलिकौमुदी' में श्रीमती राधारानी अपनी सखी से कहती हैं, "हे सखि ! श्रीकृष्ण की कीर्ति न सुन पाने से तो अच्छा हो यदि मैं बहरी