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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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पृष्ठ 233

२०६ ] भक्तिरसामृतसिन्धु महोत्सवों में बलराम सहित श्रीकृष्ण के ग्वाल-सखा साथ-साथ नाचा करते थे। ऐसे अवसरों पर उनके गलों में शोभित मालायें हिल्लोलित होतीं और वे पसीने से तर हो जाते। भावमय नृत्य से उनका सारा शरीर ही आर्द्र हो जाता। यह श्रम नृत्यजनित है। श्रीमद्भागवत (१०.३३.२०) में उल्लेख है कि नृत्य, आलिंगन तथा चुम्बन के द्वारा श्रीकृष्ण के साथ प्रेमविलास का आस्वादन करने के उपरान्त गोपियाँ अति श्रमित हो जातीं। ऐसे में अपनी अहैतुकी दया से प्रेरित होकर श्रीकृष्ण उनके मुखों को अपने करकमल से पोंछते थे। यह रति से उत्पन्न श्रम का दृष्टान्त है। मद जब कोई मद्यपान से अथवा मदन-विकार के अतिरेक से मदमत्त हो जाता है तो गति, अंगों और स्वर में स्खलन, आँखों का सूजना तथा शरीर पर लालिमा आदि लक्षण प्रकट होते हैं। 'ललितमाधव' में उल्लेख है कि अत्यधिक मधुपान से मत्त भगवान् बलराम कहने लगे, "हे राजारूप चींटियो! तुम डर कर बिलों में क्यों छिप गए हो? अरे शची के खिलौने (इन्द्र)! तू हँसता क्यों है? अब मैं सम्पूर्ण जगत् का नाश करूँगा। फिर भी श्रीकृष्ण मुझ पर क्रोध नहीं करेंगे।" फिर वे श्रीकृष्ण से कहते हैं, "हे कृष्ण! क्या कारण है कि सम्पूर्ण पृथ्वी भ्रमित हो रही है तथा चन्द्रमा नीचे लटक रहा है। ये सब यादव मुझ पर हँसते क्यों हैं? कृपया कदम्ब मधु से बनी मेरी मदिरा शीघ्र लाओ।" श्रील रूप गोस्वामी की प्रार्थना है कि इस प्रकार मदमत्त के समान बोलते हुए भगवान् बलराम हम सब का कल्याण करें। इस मत्त दशा में बलरामजी को श्रम हुआ और वे विश्राम के लिए पड़ गए। सामान्यतः उत्तम पुरुष मद से सो जाता है, मध्यम पुरुष हँसता-गाता है और अनिष्ठ अपशब्द बोलता है अथवा कभी-कभी रोता भी है। आयु और मनोभाव के भेद से यह मद नाना प्रकार से अभिव्यक्त होता है। उपयोगी न होने से श्रील रूप गोस्वामी इस विषय का अधिक विवेचन नहीं करते। काम विकार के आधिक्य से उत्पन्न मद का उदाहरण श्रीकृष्ण के दर्शन से राधारानी में प्रकट हुआ। कभी वे इधर-उधर चलती हैं, कभी हँसती हैं, कभी मुख छिपा लेती हैं, कभी प्रजल्प करती हैं, तो कभी अपनी सखियों को प्रणाम करती हैं। राधारानी में इन लक्षणों का अवलोकन कर